रूस से ऊर्जा आयात पर भारत का बड़ा खर्च, CREA रिपोर्ट में चीन सबसे बड़ा खरीदार



भारत ने 5.8 अरब यूरो के रूसी हाइड्रोकार्बन खरीदे, 83% हिस्सा कच्चे तेल का; चीन ने 7 अरब यूरो की खरीद के साथ टॉप पर जगह बनाई


नई दिल्ली। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इसी कड़ी में सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत ने रूसी हाइड्रोकार्बन के आयात पर भारी खर्च किया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने कुल 5.8 अरब यूरो (करीब 6.7 अरब डॉलर) के रूसी हाइड्रोकार्बन का आयात किया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल का रहा, जिसकी हिस्सेदारी करीब 83 प्रतिशत बताई गई है। यह आंकड़ा दिखाता है कि भारत की ऊर्जा जरूरतों में रूसी तेल की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है।

CREA की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चीन इस मामले में भारत से आगे रहा। चीन ने रूस से कुल मिलाकर लगभग 7 अरब यूरो (करीब 8.1 अरब डॉलर) की ऊर्जा खरीद की, जिससे वह रूसी ऊर्जा का सबसे बड़ा आयातक बना रहा। यह रुझान वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एशियाई देशों की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत और चीन जैसे देशों ने सस्ते दामों पर रूसी तेल खरीदने का अवसर लिया। इससे इन देशों को ऊर्जा लागत कम रखने में मदद मिली, वहीं रूस को भी अपने निर्यात को बनाए रखने का विकल्प मिला।

भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर फैसले लिए हैं। सरकार का कहना है कि देश की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए सस्ते और स्थिर स्रोतों की आवश्यकता है, और इसी कारण रूस से तेल आयात जारी रखा गया है।

हालांकि, इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार सवाल भी उठे हैं, खासकर पश्चिमी देशों की ओर से। लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपने आर्थिक और ऊर्जा हितों के आधार पर ही निर्णय लेगा।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा बाजार और अधिक जटिल हो सकता है। ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति को संतुलित बनाए रखना होगा, ताकि न केवल जरूरतें पूरी हों बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबावों का भी सामना किया जा सके।

कुल मिलाकर, CREA की यह रिपोर्ट भारत और चीन जैसे देशों की ऊर्जा रणनीति और वैश्विक बाजार में उनके बढ़ते प्रभाव को उजागर करती है। यह स्पष्ट संकेत है कि आने वाले वर्षों में एशियाई देश ऊर्जा बाजार में निर्णायक भूमिका निभाते रहेंगे।

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