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“Separate Electorate” (अलग निर्वाचक मंडल) को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है. यह कोई नया मुद्दा नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें हमारे आज़ादी से पहले के इतिहास में जाकर मिलती हैं। हाल ही में चंद्रशेखर आज़ाद रावण (भीम आर्मी प्रमुख) ने संसद में दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग कर दी है, जिससे राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है.
आइए, इस पूरे विवाद को शुरू से समझते हैं – क्या है Separate Electorate, इसकी शुरुआत कैसे हुई, गांधी-अंबेडकर में इसको लेकर क्या लड़ाई हुई, और आज फिर से यह विवाद क्यों गरम हुआ है.
सबसे पहले, ये "Separate Electorate" है क्या? (बिल्कुल सरल भाषा में)
सीधा सा मतलब है – "अपने समुदाय का वोटर अपने समुदाय के उम्मीदवार को ही वोट देगा।"
जैसे, Separate Electorate लागू होने पर एक मुस्लिम वोटर सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवार को ही वोट कर सकता है. वह हिंदू, सिख या किसी और समुदाय के उम्मीदवार को वोट नहीं डाल सकता . जबकि आज जो सिस्टम है (ज्वाइंट इलेक्टोरेट), उसमें पूरा देश एक ही वोटर लिस्ट होती है, और हर कोई किसी को भी वोट कर सकता है .
यानी अलग निर्वाचक मंडल में समुदाय अलग-अलग बंट जाते हैं और अपना-अपना नेता खुद चुनते हैं.
अलग निर्वाचक मंडल का इतिहास – कहां से शुरू हुआ ये खेल?
1. शुरुआत: अंग्रेजों की चाल (1909)
यह पूरा खेल उस समय शुरू हुआ जब भारत में अंग्रेज राज था। 1909 में लॉर्ड मिंटो (वायसराय) ने एक कानून बनाया – भारतीय परिषद अधिनियम 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधार).
इस कानून के तहत पहली बार मुसलमानों को अलग निर्वाचक मंडल देने का प्रावधान रखा गया . अंग्रेजों की यह क्लासिक "बांटो और राज करो" वाली चाल थी. उन्होंने सोचा कि अगर हिंदू-मुसलमान अलग-अलग वोट करेंगे, तो बंटे रहेंगे और अंग्रेजों की सत्ता बनी रहेगी.
2. और आगे बढ़ी यह व्यवस्था (1919 से 1935 तक)
1919 के मोंटागू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने इस व्यवस्था को और मजबूत किया. और फिर 1935 के भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act 1935) ने तो मुसलमानों और दलितों (तब उन्हें depressed classes कहा जाता था) दोनों के लिए अलग निर्वाचक मंडल लागू कर दिया .
यह वह समय था जब सांप्रदायिक राजनीति ने जोर पकड़ा और आगे चलकर देश का बंटवारा हुआ. Banglapedia (विश्वकोश) के अनुसार, इसी सिस्टम ने अलगाववाद (separatism) को बढ़ावा दिया और दो-राष्ट्र सिद्धांत को मजबूत किया .
गांधी बनाम अंबेडकर: पूना पैक्ट की ऐतिहासिक लड़ाई
1932: अंबेडकर ने मांगा दलितों के लिए Separate Electorate
1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने "साम्प्रदायिक अवार्ड" की घोषणा की, जिसमें मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों और "डिप्रेस्ड क्लासेस" (दलितों) को अलग निर्वाचक मंडल देने का प्रस्ताव था .
डॉ. भीमराव अंबेडकर इस प्रस्ताव के पक्ष में थे। उनका तर्क था कि बिना अलग निर्वाचक मंडल के दलितों का राजनीतिक दमन होता रहेगा. उन्हें लगता था कि ज्वाइंट इलेक्टोरेट में ऊंची जाति के उम्मीदवार ही जीतते रहेंगे, इसलिए एक अलग चुनाव क्षेत्र ही दलितों को सशक्त बनाएगा .
गांधी ने कर दिया आमरण अनशन
महात्मा गांधी इसके सख्त खिलाफ थे। उनका कहना था कि इससे हिंदू समाज और टूटेगा और दलित हमेशा के लिए बाहर हो जाएंगे. वह यह भी नहीं चाहते थे कि देश के बंटवारे की तरह दलित भी अलग हो जाएं .
गांधी जी ने 18 सितंबर 1932 को आमरण अनशन शुरू कर दिया. पूरे देश में दबाव बन गया. अंत में, 24 सितंबर 1932 को अंबेडकर और गांधी के बीच "पूना पैक्ट" पर हस्ताक्षर हुए .
क्या था पूना पैक्ट का समझौता? पूरी जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें (Poona Pact)
Separate Electorate खत्म: दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग को हटा लिया गया.
साझा निर्वाचक मंडल + आरक्षण: तय हुआ कि दलित साझा निर्वाचक मंडल (joint electorate) में वोट करेंगे, लेकिन उनके लिए सीटें आरक्षित (reserved seats) रखी जाएंगी .
सीटों की संख्या बढ़ाई गई: इस पैक्ट में दलितों को ज्यादा सीटें दी गईं (148 सीटें) .
हालांकि, अंबेडकर इस समझौते से खुश नहीं थे. उन्होंने इसे "ब्लैकमेल" और "ब्लैक बजट" कहा था. उनका मानना था कि दूसरा वोट (double vote) उनके लिए एक बहुत बड़ा हथियार था जो छिन गया .
संविधान और Separate Electorate का एकदम साफ शब्दों में निषेध
जब देश आजाद हुआ और संविधान बना, तो इन पुराने झगड़ों को खत्म करने के लिए एक सख्त प्रावधान रखा गया.
अनुच्छेद 325 (Article 325): बिल्कुल साफ कहता है कि "किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जाएगा या किसी अलग सूची में रखा जाएगा."
नहीं बनेगा अलग दायरा: यानी 1950 के बाद जन्मे नौजवानों के लिए तो कोई अलग वोटर लिस्ट बनेगी ही नहीं .
क्योंकि अलग निर्वाचक मंडल का मतलब है, देश को टुकड़ों में बांटना. आज का संविधान सिर्फ "साझा निर्वाचक मंडल + आरक्षण" की व्यवस्था करता है .
आखिर ये पुराना मुद्दा फिर से क्यों गरम हो गया?
हाल ही में चंद्रशेखर आज़ाद रावण (जिन्हें पहले चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से जाना जाता था) ने लोकसभा में दलितों के लिए Separate Electorate की मांग कर दी .
उनका तर्क क्या है?
उनका कहना है कि सिर्फ आरक्षण (रिजर्वेशन) से काम नहीं चलेगा. वह कहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में असली सत्ता दलितों को नहीं मिल रही. इसलिए उन्होंने मांग की है कि दलितों को अलग चुनाव क्षेत्र मिले, ताकि वे अपना खुद का नेता चुन सकें .
विरोधी क्या कहते हैं?
आलोचकों का तर्क है कि यह मांग असंवैधानिक है. यह अनुच्छेद 325 का सीधा उल्लंघन है. दूसरा, इससे समाज में और बंटवारा होगा. तीसरा, अंबेडकर ने खुद अपने करियर के अंतिम दौर में इस विचार को खारिज कर दिया था और ज्वाइंट इलेक्टोरेट (साझा निर्वाचक मंडल) का समर्थन किया था .
निष्कर्ष: इतिहास का सबक
1909 में अंग्रेजों ने जिस हथियार का आविष्कार किया था, उसे अंबेडकर ने कुछ समय के लिए अपनाया, लेकिन पूना पैक्ट के बाद उसे अलमारी में रख दिया गया. 1950 में संविधान ने उस पर ताला लगा दिया .
अब जब ये मांग कई दशकों बाद फिर उठ रही है, तो यह एक बड़ा सवाल खड़ा करती है: क्या इससे दलित सशक्त होंगे, या फिर देश की एकता को चोट पहुंचेगी? साफ बात यही है कि जब तक बहुमत राजनीति में रहेगी, आरक्षण की मांग होती रहेगी. लेकिन Separate Electorate एक अलग ही विवाद है.
"एक ओर गांधी का मानना था कि इससे दलित सदा के लिए बाहर हो जाएंगे, तो अंबेडकर के मन में संशय था कि भारी जनसंख्या वाले समुदाय के जुल्म से शोषित कैसे बचेंगे। इस दुविधा का हल पूना पैक्ट था – जिसने यह सुनिश्चित कर दिया कि Separate Electorate देश के सियासी नक्शे में कभी शामिल नहीं होगा।"
Separate Electorate vs Reservation – दोनों में क्या फर्क है? आसान भाषा में समझिए
पहले जान लेते हैं – Separate Electorate क्या है? (बिल्कुल सीधी बात)
नियम: इसमें "समुदाय के लोग, समुदाय के उम्मीदवार को, समुदाय के वोट से चुनेंगे।"
दूसरे शब्दों में:
अगर किसी सीट को Separate Electorate के तहत SC (अनुसूचित जाति) के लिए रखा गया है, तो उस सीट पर सिर्फ SC के लोग वोट डाल सकेंगे।
वोटिंग के समय कोई ऊंची जाति का, कोई OBC, कोई मुसलमान – कोई बाहर का व्यक्ति उस चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकता। वह सीट पूरी तरह SC के लिए बंद हो जाती है।
और सबसे बड़ी बात – उम्मीदवार भी उसी समुदाय (SC) का होगा।
सीधा मतलब: चुनाव उस समुदाय के अंदर ही होता है। बाकी सब बाहर रहते हैं।
अब समझते हैं – Reservation (आरक्षण) क्या है? (जैसा आज होता है)
नियम: इसमें "कुछ सीटें किसी समुदाय के लिए रिजर्व कर दी जाती हैं, लेकिन वोट सबके हाथ में रहता है।"
दूसरे शब्दों में:
मान लीजिए एक विधानसभा सीट SC के लिए reserved है।
इसका मतलब यह है कि उस सीट पर चुनाव तो SC का उम्मीदवार ही लड़ सकता है।
लेकिन वोट देने का अधिकार हर किसी को है – चाहे वो SC हो, OBC हो, जनरल हो, मुसलमान हो, कोई भी हो। सबका वोट एक समान गिना जाता है।
सीधा मतलब: उम्मीदवार तो समुदाय विशेष का है, लेकिन उसे सभी समुदायों के लोगों के वोट से जीतना पड़ता है। उसे सबको राजी करना पड़ता है।
एक उदाहरण से समझिए – (इतना आसान, बच्चा भी समझ जाएगा)
मान लीजिए आपके शहर में एक स्कूल है। उस स्कूल का चेयरमैन चुनना है। दो व्यवस्थाएं देखिए:
Separate Electorate वाले स्कूल में:
केवल सिंह परिवार के लोग वोट डालेंगे।
केवल सिंह परिवार का कोई सदस्य उम्मीदवार बनेगा।
यानी शर्मा, गुप्ता, खान – कोई वोट नहीं डाल सकता। बाकी सबको चुनाव से बाहर रखा गया।
Reservation वाले स्कूल में:
सीट सिंह परिवार के लिए reserved है। यानी चेयरमैन सिंह परिवार से ही होगा।
लेकिन वोट पूरे स्कूल के हर परिवार (सिंह, शर्मा, गुप्ता, खान – सब) को देने का अधिकार है।
अब सिंह परिवार का उम्मीदवार अगर चेयरमैन बनना है, तो उसे सिर्फ अपने परिवार के नहीं, बल्कि शर्मा, गुप्ता, खान – सबको मनाना होगा। उसे सबके साथ जुड़ना होगा, सबकी सुननी होगी।
यही फर्क है।
एक तस्वीर में देख लीजिए –
| पहलू | Separate Electorate | Reservation (वर्तमान व्यवस्था) |
|---|---|---|
| वोट किसे देने का हक? | सिर्फ उसी समुदाय के लोगों को | सभी नागरिकों को (चाहे कोई भी समुदाय हो) |
| नेता किस समुदाय से आएगा? | उसी समुदाय से | उसी समुदाय से (क्योंकि सीट reserved है) |
| चुनाव की प्रकृति | समुदाय के भीतर ही | समुदाय को सबका समर्थन चाहिए |
| बाकी समुदायों की भूमिका | शून्य (कोई हिस्सा नहीं) | पूरी और सक्रिय (वोट डालते हैं) |
| राष्ट्रीय एकता पर असर | समाज को बांट सकता है | सबको एक साथ लाता है |
दोनों के पीछे इतिहास और आज
1. Separate Electorate की असली वजह क्या थी?
डॉ. भीमराव अंबेडकर का मानना था कि साझा निर्वाचक मंडल (joint electorate) में ऊंची जाति का बाहुल्य इतना भारी होता है कि दलित उम्मीदवार कभी नहीं जीत सकता। इसलिए उन्होंने अलग निर्वाचक मंडल की मांग की, ताकि दलित अपना नेता खुद चुन सकें।
2. गांधी ने क्यों किया विरोध?
महात्मा गांधी को लगा कि इससे हिंदू समाज स्थायी रूप से टूट जाएगा। दलित हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने आमरण अनशन किया।
3. पूना पैक्ट (1932) – जो मध्य रास्ता निकाला गया
अंत में तय हुआ कि Separate Electorate खत्म कर दी जाएगी, लेकिन दलितों के लिए आरक्षित सीटें (reserved seats) बढ़ा दी जाएंगी। यानी सीटें तो SC के लिए रिजर्व होंगी, लेकिन वोटिंग में सब हिस्सा लेंगे।
4. और आज संविधान क्या कहता है?
अनुच्छेद 325 (Article 325) साफ-साफ कहता है – "किसी भी व्यक्ति को धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर अलग मतदाता सूची में नहीं रखा जाएगा।" यानी Separate Electorate पर संवैधानिक रोक है।
तो क्या Reservation और Separate Electorate दोनों एक ही चीज़ हैं?
बिल्कुल नहीं। फर्क क्रिस्टल क्लियर है:
Reservation: सीट तो किसी समुदाय के लिए बुक है, लेकिन उस सीट पर सबके वोट से नेता चुनना पड़ता है। यानी नेता सबको जवाबदेह है।
Separate Electorate: सीट भी अलग, वोटर भी अलग। यानी समुदाय अपने चुनाव में खुद बंद हो जाता है। – किसी और की उस चुनाव में कोई एंट्री नहीं।
आसान से शब्दों में:
Reservation का मतलब है – थोड़ी सीटें अलग, लेकिन वोटिंग एक साथ।
Separate Electorate का मतलब है – पूरा चुनाव अलग।
तो आखिर क्यों नहीं लागू हो सकता Separate Electorate?
यह अनुच्छेद 325 का उल्लंघन है।
यह देश को धार्मिक और जातिगत खांचों में बांट देगा।
यह राष्ट्रीय एकता के खिलाफ है।
संविधान निर्माताओं ने यह माना कि भारत जैसे विविधता वाले देश में अलग चुनाव क्षेत्र अलगाववाद को बढ़ावा देंगे।
आखिरी और सबसे जरूरी बात (कंक्लूजन)
गांधी बनाम अंबेडकर का झगड़ा था – चाहे Separate Electorate हो या न हो, लेकिन दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए।
पूना पैक्ट में झगड़ा तो खत्म हुआ, लेकिन सियासी लड़ाई कभी पूरी नहीं हुई।
Reservation यानी साझा मतदाता सूची (common voter list) और आरक्षित सीटें (reserved seats)। Separate Electorate नामुमकिन है – क्योंकि यह भारत के संविधान की आत्मा के खिलाफ है।
Reservation in India explained-भारत में आरक्षण की व्याख्या जानने के लिए क्लिक करें

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