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| Photo: Wikimedia Commons |
बेंगलुरु | 31 मई 2026
कर्नाटक की राजनीति में जो अनिश्चितता का दौर चल रहा था, वह आखिरकार खत्म हो गया है। कांग्रेस ने अपने नए मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लगा दी है। पार्टी विधायक दल की नेता के तौर पर डीके शिवकुमार को चुन लिया गया है और वह 3 जून को शपथ लेंगे.
यह ऐलान राज्य के राजनीतिक गलियारों में चल रही सारी अटकलों पर विराम लगाने वाला है. आइए, समझते हैं कि यह फैसला कैसे हुआ, क्यों हुआ और आगे क्या होगा.
नाम तय कैसे हुआ? (अंदरूनी खेल)
मान लीजिए, आप एक क्रिकेट टीम के कप्तान हैं. टीम ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन आपको लगता है कि कप्तान बदलने की जरूरत है. कर्नाटक में कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही हुआ।
पिछले कुछ दिनों से यह चर्चा जोरों पर थी कि मौजूदा सीएम सिद्धारमैया को हटाकर डीके शिवकुमार को मौका दिया जाएगा. बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय नेतृत्व और सिद्धारमैया के बीच एक समझौता हुआ। समझौते के तहत, शिवकुमार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकार पूरे पांच साल चले, जबकि सिद्धारमैया को केंद्र या राज्य स्तर पर कोई बड़ी संवैधानिक पद या प्रभाव वाली जगह देने पर सहमति बनी.
डीके शिवकुमार कौन हैं और उन्हें क्यों चुना गया?
आप शिवकुमार को कर्नाटक कांग्रेस का ‘संकटमोचक’ कह सकते हैं.
प्रचंड संगठनकर्ता: पार्टी के भीतर उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो अपनी पहुंच और योजनाओं से पार्टी कार्यकर्ताओं को जोड़े रखता है.
क्षेत्रीय संतुलन: शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. यह कर्नाटक के सबसे प्रभावशाली समुदायों में से एक है.
फील्ड कमांडर: उन्होंने पिछले चुनावों में कई मुश्किल घड़ियों में पार्टी को संभाला है. ऐसे में पार्टी हाईकमान ने उनपर भरोसा जताया.
अब आगे क्या होगा?
शपथ ग्रहण: डीके शिवकुमार 3 जून 2026 को बेंगलुरु के ऐतिहासिक लोक भवन (ग्लास हाउस) में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. कार्यक्रम को बहुत ज्यादा धूमधाम नहीं, अपेक्षाकृत सादगी से करने की बात कही जा रही है.
कैबिनेट विस्तार: सबसे बड़ी चुनौती कैबिनेट मंत्रियों के चयन की होगी. शिवकुमार को अपने सहयोगियों और सिद्धारमैया खेमे के नेताओं को संतुलित करके टीम बनानी है.
विकास के एजेंडे: शिवकुमार के सामने जो चुनौतियाँ होंगी, उनमें कानून-व्यवस्था सुधार, निवेश आकर्षित करना, और 2028 के लोकसभा चुनाव की तैयारी शामिल होगी.
लोअर लाइन (निचली पंक्ति)
कर्नाटक में सत्ता का यह हस्तांतरण कांग्रेस हाईकमान की एक बड़ी राजनीतिक चाल है. वे सिद्धारमैया के पुरानेपन और थकान को शिवकुमार की सक्रियता और ऊर्जा से बदलना चाहते हैं. अब यह देखने वाली बात होगी कि शिवकुमार 'किंग' नहीं, बल्कि 'किंगमेकर' होते हैं, या वे एक कुशल प्रशासक के रूप में उभरते हैं. अगले कुछ ही दिनों में तस्वीर साफ हो जाएगी.

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