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| Photo: Wikimedia Commons |
ब्रसेल्स | 31 मई 2026
यूरोपीय संघ (EU) की विदेश नीति की प्रमुख काजा कलास (Kaja Kallas) ने रूस को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा शांति वार्ताएं कोई वास्तविक समाधान नहीं हैं, बल्कि "रूसी जाल" हैं। उनका आरोप है कि मॉस्को इन वार्ताओं का इस्तेमाल असल में EU की अंदरूनी कमजोरियों को बेनकाब करने और उसे राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने के लिए कर रहा है.
काजा कलास का पूरा तर्क: दरअसल वो क्या कहना चाहती हैं?
कलास जो बात कह रही हैं, वह थोड़ी पेचीदा है, लेकिन सीधा मतलब यह है:
"जाल" का असली अर्थ: कलास का कहना है कि रूस पश्चिमी देशों (EU) को बातचीत के नाम पर एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसाना चाहता है, जहां बार-बार सिर्फ यही चर्चा हो कि "बात कौन करेगा" और "कब करेगा"। इस उलझन में ही EU कमजोर पड़ जाता है.
कौन है काबिल: कलास का आरोप है कि रूस पहले से ही मानसिक रूप से तय कर चुका है कि किस पश्चिमी नेता के साथ वह बात करेगा और किससे नहीं। वह EU को बताना चाहता है कि "तुम्हारे लिए कौन ठीक है" .
EU अंदर ही अंदर क्यों फंसा है?
कलास की इस तीखी प्रतिक्रिया के पीछे यूरोपीय संघ की एक बड़ी कूटनीतिक विफलता भी है:
नेतृत्व का संकट: अमेरिका और रूस सीधी बातचीत कर रहे हैं. इन वार्ताओं में EU की भूमिका लगभग न के बराबर है. यूरोपीय नेता इस बात से नाराज हैं कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया.
अंदरूनी फूट (बेहद अहम बात): सबसे बड़ी समस्या यह है कि EU के 27 देश खुद आपस में सहमत नहीं हैं कि रूस से बात कौन करेगा.
फ्रांस के मैक्रों पिछले काफी समय से रूस से बातचीत की वकालत कर रहे हैं.
वहीं, जर्मनी और पूर्वी यूरोप के देश (पोलैंड, बाल्टिक राज्य) रूस पर भरोसा नहीं करते और युद्ध जारी रखने के पक्ष में हैं.
इस आंतरिक फूट के कारण EU अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि शांति वार्ता के लिए "एकजुट आवाज" क्या होगी. कलास जहां एक ओर इस फूट को दूर करने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर लावरोव जैसे रूसी नेता इसी फूट का फायदा उठाने की कोशिश में हैं.
रूस का पलटवार: क्या बोले लावरोव?
जाहिर है, रूस ने कलास के इस बयान को हल्के में नहीं लिया. रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इसे "बेवकूफी भरे बयान" की संज्ञा दी और उन्होंने सीधे तौर पर कलास द्वारा रखी गई एक प्रमुख शर्त (रूसी सेना पर प्रतिबंध) को खारिज कर दिया.
लावरोव का यह सीधा इनकार बताता है कि रूस अब कूटनीति के जरिए पश्चिम पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है.
निचली पंक्ति: क्या बन पाएगी शांति?
यह बहुत मुश्किल लग रहा है।
EU की जद्दोजहद: कलास का आरोप है कि रूस बातचीत की प्रक्रिया को फंसा रहा है, जबकि EU के पास खुद कोई ठोस विकल्प नहीं है.
भरोसे का अभाव: दोनों पक्ष एक-दूसरे पर झूठ बोलने और समझौता तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं. इस माहौल में कोई सार्थक वार्ता होना मुश्किल है.
अभी स्थिति यह है कि कलास के इस बयान ने EU की निराशा और रूस के प्रति उसके सख्त रवैये को दोहराया है. जब तक EU इस पर एकजुट नहीं हो जाता कि "वार्ता कैसे करनी है" और "क्या चाहिए", तब तक लगता है कि शांति वार्ता ठप्प ही रहेगी.

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