कोलकाता | 29 मई 2026
कोलकाता के एक प्रतिष्ठित शोध संस्थान IACS (इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे सोलर एनर्जी का इस्तेमाल आज से बिल्कुल अलग हो जाएगा। उन्होंने उच्च गुणवत्ता वाले अमॉर्फस सिलिकॉन सोलर सेल और बेहद पतली (थिन-फिल्म) फोटोवोल्टिक फिल्में बनाने के लिए एक स्वदेशी PE-CVD मशीन बनाई है.
ये तकनीक क्यों है खास?
बात को थोड़ा सा सरल करते हैं। आपने घरों की छतों पर लगने वाले भारी-भरकम सोलर पैनल देखे होंगे, जो कांच और एल्यूमीनियम के बने होते हैं। ये पैनल सीधे और सख्त होते हैं, इन्हें मोड़ा नहीं जा सकता.
लेकिन IACS ने जो तकनीक विकसित की है, उससे इतनी पतली और हल्की सोलर फिल्म (फ्लेक्सिबल सोलर फिल्म) बनाई जा सकती है कि इसे किसी भी चीज़ पर, किसी भी तरह से चिपकाया या लपेटा जा सकता है. कल्पना करें:
किसी बैग या जैकेट पर लगी सोलर फिल्म आपका फोन चार्ज कर रही है,
किसी पेड़ या पहाड़ पर चिपकी पतली फिल्म बिजली बना रही है,
किसी घर की खिड़की पर लगी पारदर्शी फिल्म सूरज की रोशनी से बिजली बना रही है.
यह फिल्म लचीली है और कम रोशनी में भी बिजली बना सकती है, जो पुराने सोलर पैनलों की बड़ी सीमा है.
यह तकनीक लैब में रहकर बाजार तक कैसे पहुंचेगी?
अक्सर ऐसा होता है कि कोई बढ़िया रिसर्च तो हो जाती है, लेकिन उसे प्रोडक्ट में बदलने और बाजार तक पहुंचाने में सालों लग जाते हैं। इसी दिक्कत को देखते हुए वैज्ञानिकों ने अपनी इस PE-CVD मशीन को RETINA प्लेटफॉर्म के साथ इंटीग्रेट किया है. यह एक ऐसा सेटअप है, जो लैब में ही कमर्शियल स्केल पर प्रोडक्ट बनाने और उसकी टेस्टिंग करने में मदद करता है . यानी अब कंपनियों को बिना बड़ा जोखिम उठाए, इस नई तकनीक को आजमाने और अपनाने का मौका मिलेगा.
सिर्फ सोलर पैनल ही नहीं, नई तकनीक के और भी बहुत बड़े मायने हैं
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक आने वाले समय में फोन, लैपटॉप, स्मार्टवॉच, और यहां तक कि खिड़कियों और पर्दों को भी ऊर्जा दे सकती है। इसका इस्तेमाल सिलिकॉन-पेरोवस्काइट टेंडेम सेल्स और OLED डिस्प्ले (जैसे टीवी और मोबाइल स्क्रीन) जैसी हाई-टेक चीजों में भी किया जा सकता है. यह वियरेबल टेक्नोलॉजी (स्मार्टवॉच, फिटनेस बैंड) और बायो-सेंसर्स के लिए भी बहुत उपयोगी है.
भारत के लिए क्यों है यह मील का पत्थर?
सीधे शब्दों में कहें, तो यह पूरी तरह से स्वदेशी मेक इन इंडिया तकनीक है. अब हमें उन्नत सोलर फिल्मों के लिए विदेशों की तकनीक पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इस तरह की उच्च-तकनीक विनिर्माण को बढ़ावा देने से देश में नई-नई कंपनियां और स्टार्टअप बनेंगे, जिससे "आत्मनिर्भर भारत" के सपने को मजबूती मिलेगी.
यह कोलकाता का बहुत ही गर्व का क्षण है और एक उदाहरण है कि हमारे वैज्ञानिक अब दुनिया की कठिनतम तकनीकों को देसी जुगाड़ से नहीं, बल्कि देसी साइंस से हल कर रहे हैं.

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