TMC के 20 बागी सांसदों का NCPI में विलय, NDA को समर्थन; बंगाल से दिल्ली तक तेज हुई सियासी हलचल

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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रही उथल-पुथल अब राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े घटनाक्रम में तब्दील होती दिखाई दे रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का दावा करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है और संसद में अलग बैठने की मांग की है। साथ ही, इन सांसदों ने भविष्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने का भी संकेत दिया है। इस घटनाक्रम ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC को बड़ा झटका दिया है और राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा शुरू हो गई है।

लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात, अलग गुट की मान्यता की मांग

बागी सांसदों के समूह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अपने अलग गुट की मान्यता की मांग रखी। सांसदों का दावा है कि उनकी संख्या दल की कुल लोकसभा ताकत के दो-तिहाई से अधिक है, इसलिए दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें वैध विलय का लाभ मिल सकता है। यदि लोकसभा अध्यक्ष इस विलय को मंजूरी देते हैं, तो संसद में NCPI की ताकत अचानक बढ़ जाएगी और NDA को भी संख्यात्मक लाभ मिल सकता है।

बागी सांसदों ने क्या कहा?

बागी गुट की ओर से सामने आए नेताओं ने कहा कि वे राष्ट्रीय हित और विकास के एजेंडे के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं। सांसदों ने कहा कि वे NCPI के मंच से राजनीति करेंगे और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में NDA के साथ सहयोग करेंगे। इस बयान को बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

कौन है NCPI? तीन साल पुरानी पार्टी का अचानक उभार

NCPI यानी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया, हाल तक राष्ट्रीय राजनीति में अपेक्षाकृत कम चर्चित पार्टी मानी जाती थी। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2023 में पश्चिम बंगाल के उत्तिया कुंडू और उनकी पत्नी शेउली कुंडू ने इस पार्टी की स्थापना की थी। पार्टी दस्तावेजों में उत्तिया कुंडू को राष्ट्रीय अध्यक्ष और शेउली कुंडू को कोषाध्यक्ष के रूप में दर्ज किया गया है।

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि पार्टी के संस्थापक उत्तिया कुंडू ने 13 मई को सोशल मीडिया पर पश्चिम बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ तस्वीर साझा करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बनने की शुभकामनाएं दी थीं। ऐसे में TMC के बागी सांसदों का इसी अपेक्षाकृत नई पार्टी में विलय कई राजनीतिक सवाल खड़े कर रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल तीन वर्ष पुरानी पार्टी में एक साथ 20 सांसदों का शामिल होना भारतीय राजनीति की असाधारण घटनाओं में गिना जा सकता है, क्योंकि इससे पार्टी का संसदीय महत्व अचानक बढ़ गया है।

दलबदल कानून से बचने की रणनीति?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बागी सांसदों द्वारा सीधे किसी बड़ी पार्टी में शामिल होने के बजाय NCPI जैसे दल के साथ विलय का रास्ता चुनना एक रणनीतिक कदम हो सकता है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि इससे सांसदों को दलबदल कानून के तहत तत्काल अयोग्यता के खतरे से बचने में मदद मिल सकती है।

यदि यह विलय कानूनी और संवैधानिक रूप से मान्य हो जाता है, तो यह भारतीय संसदीय इतिहास में एक मिसाल कायम करेगा, जहाँ एक मुख्य विपक्षी दल से 20 सांसद अचानक एक नई पार्टी में चले गए हों।

TMC नेतृत्व पर उठे सवाल, ममता बनर्जी के लिए बड़ी चुनौती

बागी सांसदों के इस कदम के बाद पार्टी नेतृत्व पर भी सवाल उठने लगे हैं। कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि किसी भी राजनीतिक दल में आंतरिक लोकतंत्र होना चाहिए और निर्णय प्रक्रिया कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हालांकि TMC के शीर्ष नेतृत्व ने अब तक इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेने से इनकार किया है और पार्टी के भीतर अनुशासन बनाए रखने की बात कही है।

लेकिन 20 सांसदों का एक साथ जाना TMC के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है, जिससे ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर होने की आशंका जताई जा रही है।

बंगाल की राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद से राज्य की राजनीति में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ऐसे समय में लोकसभा के 20 सांसदों का अलग होना TMC के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर चुनौती माना जा रहा है।

यदि यह घटनाक्रम आगे बढ़ता है, तो बंगाल की विपक्षी राजनीति और आगामी चुनावी रणनीतियों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

NDA को कितना फायदा?

संसदीय गणित के लिहाज से यह घटनाक्रम NDA के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि विलय की प्रक्रिया पूरी होती है और सांसद औपचारिक रूप से NDA का समर्थन करते हैं, तो संसद में सरकार की स्थिति और मजबूत हो सकती है, खासकर महत्वपूर्ण विधेयकों के दौरान।

फिलहाल सबकी नजर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले और चुनाव आयोग की संभावित भूमिका पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि बागी सांसदों का दावा कानूनी रूप से कितना मजबूत है और इसका राष्ट्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है।

बंगाल की बगावत ने दिल्ली में मचाई हलचल

TMC में शुरू हुई यह बगावत अब बंगाल की सीमाओं से निकलकर देश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। 20 सांसदों का एक साथ विलय, दलबदल कानून की पेचीदगियाँ, और NDA को समर्थन देने का संकेत – सब कुछ मिलाकर यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में और भी रोचक मोड़ ले सकता है।

अब लोकसभा अध्यक्ष के फैसले का इंतजार है। साथ ही, चुनाव आयोग भी इस पर अपनी राय रख सकता है। तब तक, बंगाल की सियासत में उठी इस धूल का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है – TMC में बगावत ने अब एक नया और बड़ा सियासी समीकरण लिखना शुरू कर दिया है।

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