
Image Source : FB/Krishna Kumar
कबीरधाम। एक तस्वीर सामने आई है – जिसे देखकर आंखें नम हो जाती हैं और मन विचलित हो उठता है। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में एक पति ने अपनी बीमार पत्नी को बाइक पर खाट बांधकर कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचाया। यह नजारा देखकर लगा जैसे कोई मजबूर इंसान जिंदगी की आखिरी सांस तक संघर्ष कर रहा हो। पति का कहना है – मैं कैंसर से जूझ रही अपनी पत्नी का इलाज नहीं करा पा रहा हूं, अब प्रशासन ही हमारी मदद कर सकता है।
कौन है यह पति, और क्या है उसकी व्यथा?
समलू मरकाम कबीरधाम जिले के एक छोटे से गांव में रहते हैं। उनकी पत्नी पिछले कई महीनों से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है। इलाज के लिए अस्पताल के चक्कर, दवाइयां, टेस्ट, सब कुछ चल रहा था, लेकिन धीरे-धीरे बचत खत्म हो गई। जो जमीन थी, वह भी बिक गई। रिश्तेदारों से कर्ज लिया गया, लेकिन अब कर्ज देने वाला भी कोई नहीं बचा था। इसके बावजूद बीमारी ने पीछा नहीं छोड़ा।
समलू के पास अब न तो पैसा था और न ही कोई रास्ता। पति का मन टूट रहा था, पर हार मानने को तैयार नहीं था। तभी उन्होंने सोचा – क्यों न सीधे प्रशासन के दरवाजे पर ही आवाज उठाई जाए। और फिर उन्होंने वह कर दिखाया, जो शायद ही कोई कभी सोच सकता है।
बाइक पर खाट बांधी, बीमार पत्नी को लेकर निकल पड़े
समलू ने एक पुरानी मोटरसाइकिल में दो लकड़ियां और रस्सियां बांधकर उस पर एक खाट तैयार की। उसी खाट पर अपनी बीमार पत्नी को लिटाया और सीधा कलेक्टर कार्यालय का रुख किया। बाइक धीरे-धीरे चल रही थी, पीछे बीमार पत्नी कराह रही थी, सामने पति का चेहरा बेबसी से भरा था। जब यह जोड़ा कलेक्टर कार्यालय पहुंचा, तो वहां मौजूद हर कोई सन्न रह गया। कोई रोने लगा, तो किसी की आंखें नम हो गईं। सड़क किनारे खड़े लोगों ने जब यह नजारा देखा, तो उनके होश उड़ गए।
प्रशासन से मांगी मदद, लगाई गुहार
समलू ने कलेक्टर कार्यालय में आवेदन देते हुए कहा कि अब उनके पास पैसे का कोई जरिया नहीं बचा है। उन्होंने प्रशासन से अनुरोध किया कि वह उनकी पत्नी के इलाज में आर्थिक मदद करे। उनकी पत्नी की हालत रोजाना बिगड़ रही है। पिछले कुछ महीनों में कई कैंसर अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन हर बार पैसों की दीवार टकरा गई। वह अब कह रहे थे – “बचत खत्म हो गई, जमीन बिक गई, कर्ज ले चुका हूं, अब मैं और क्या करूं? अगर प्रशासन नहीं बचाएगा तो हमारी लाइफ बचना मुश्किल है।”
लोगों ने बढ़ाया मदद का हाथ, प्रशासन ने भी दिखाई संवेदनशीलता
जैसे ही यह खबर फैली, स्थानीय लोग अपनी जगह से हिल गए। कुछ लोगों ने मौके पर ही पैसे देने शुरू कर दिए, तो कई अस्पताल में मदद का हाथ बढ़ाने को तैयार हो गए। कलेक्टर कार्यालय से भी सूचना मिली है कि मामला संज्ञान में लिया गया है और जल्द से जल्द मरीज को उचित मदद दी जाएगी।
यह तस्वीर अब सिर्फ कबीरधाम तक सीमित नहीं रह गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी इस तस्वीर को देखकर हजारों लोग भावुक हो रहे हैं। लोग सीधे प्रशासन से मदद करने की मांग कर रहे हैं, तो कोई खुद आगे आकर कैंसर पीड़ित महिला के इलाज में योगदान दे रहा है।
एक परिवार का दर्द, पूरे समाज के लिए सवाल
यह घटना सिर्फ समलू मरकाम और उनकी पत्नी की कहानी नहीं है। यह उस हजारों परिवारों की कहानी है, जो बीमारी और गरीबी के दोहरे अभिशाप में घिरे हुए हैं। कैंसर जैसी महंगी बीमारी में इलाज के लिए लाखों रुपये चाहिए। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं मौजूद हैं, पर जरूरतमंदों तक उनका लाभ पहुंचता है या नहीं, यह बहस का विषय है।
ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अक्सर जानकारी के अभाव में योजनाओं का फायदा नहीं उठा पाते। वे प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझकर रह जाते हैं। समलू ने यहां प्रशासन की खामियों को नहीं, बल्कि उससे उम्मीद जताई है।
सोशल मीडिया पर छाया दर्द, लोगों ने जताई चिंता
ट्विटर, फेसबुक और दूसरे प्लेटफार्मों पर इस तस्वीर को हजारों लोग शेयर कर रहे हैं। कई लोग तो समलू मरकाम के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करने को तैयार हैं। सोशल मीडिया का यह उत्साह बताता है कि लोगों के मन में दया और मदद की भावना कितनी जीवित है।
लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि – आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनती है, जहां एक पति को बीमार पत्नी के साथ बाइक पर खाट बांधकर कलेक्टर ऑफिस जाना पड़े? क्यों एक इंसान को अपनी पत्नी के इलाज के लिए सड़क पर भीख मांगने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है?
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल समलू और उनकी पत्नी को कलेक्टर कार्यालय की ओर से आश्वासन मिला है कि जल्द ही सहायता दी जाएगी। आसपास के लोग और सोशल मीडिया यूजर्स भी उनके लिए फंड जुटाने में जुट गए हैं। लेकिन इस परिवार को सबसे अधिक जरूरत एक समग्र चिकित्सा सहायता की है।
एक तस्वीर ने हजारों चेहरों पर दर्द बिखेर दिया है। शायद यह समय है, जब हम सब मिलकर समलू के परिवार को सहारा दें। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि – क्या देश की स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसे ही हजारों समलूओं की आवाज सुन पाएगी, या फिर उन्हें खाट बांधकर बाइक पर सवार होना पड़ता रहेगा?
फिलहाल, सबकी नज़रें अब उस प्रशासनिक आदेश पर टिकी हैं, जो कबीरधाम के इस मजबूर पति और बीमार पत्नी को राहत दे सके। उम्मीद करते हैं कि यह तस्वीर केवल दर्द की नहीं, बल्कि एकजुटता और बदलाव की तस्वीर बन सके।
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