कोंडागांव में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर विवाद: मालगांव में उजड़े घर, ग्रामीण बोले- ‘विकास नहीं, विनाश हो रहा’

FB/krishnakumarkewat


कोंडागांव। छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले की ग्राम पंचायत मालगांव में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने विवाद का रूप ले लिया है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने बिना किसी पूर्व सूचना या वैकल्पिक व्यवस्था के उनके घरों को खाली करा दिया और उन्हें बेघर कर दिया। प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे कई पीढ़ियों से इसी क्षेत्र में रह रहे थे, लेकिन अब अचानक उन्हें बेदखल कर दिया गया है। यह मामला भूमि अधिकारों, प्रशासनिक नियमों और मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन का सवाल बन गया है।

क्या है पूरा मामला?

मालगांव में प्रशासन ने कथित अवैध कब्जों को हटाने के लिए कार्रवाई की। प्रभावित परिवारों के अनुसार, उनके घरों को जबरन गिराया गया और उनका सारा सामान बाहर फेंक दिया गया। इन परिवारों का कहना है कि वे सालों से यहाँ रह रहे थे और उनकी रोज़ी-रोटी भी इसी इलाके से जुड़ी थी। कार्रवाई के बाद अब कई परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।

एक प्रभावित महिला ने बताया – “हम यहाँ अपने पूर्वजों के ज़माने से रह रहे थे। अचानक एक दिन बुलडोजर आ गया और हमारा घर ढहा दिया गया। अब हम बाहर पड़े हैं, न छत है, न रहने की जगह। हमारे बच्चे बीमार हो रहे हैं।”

ग्रामीणों का आरोप – प्रशासन ने नहीं सुनी, बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए किया बेदखल

ग्रामीणों का कहना है कि ये परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं। उनके पास न तो कोई और जमीन है और न ही रहने के लिए कोई और जगह। कार्रवाई से पहले प्रशासन ने किसी प्रकार की सुनवाई नहीं की और न ही पुनर्वास की कोई व्यवस्था की। अब ये परिवार सड़क किनारे अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।

गाँव के एक बुजुर्ग ने कहा – “हम गरीब आदिवासी हैं। हमारे पास कागज-पत्र थोड़े होते हैं। लेकिन हम यहाँ रहते आ रहे थे। क्या सिर्फ कागजात के अभाव में हम बेघर हो जाएं? सरकार को हमारी भी सोचनी चाहिए।”

प्रशासन का पक्ष – क्या कहते हैं अधिकारी?

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई सरकारी भूमि और वन क्षेत्र को अवैध कब्जों से मुक्त कराने के लिए की गई। अधिकारियों का कहना है कि जो क्षेत्र चिन्हित किए गए, वे संरक्षित भूमि के तहत आते हैं। लंबे समय से वहाँ अतिक्रमण चल रहा था। नियमों के अनुसार, ऐसे कब्जे हटाने की कार्रवाई की जाती है। हालाँकि प्रशासन की ओर से अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो, अगर कोई भूमि सरकारी या वन विभाग के अधीन है, तो वहाँ अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन साथ ही, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और उनके अधिकारों की जांच भी जरूरी हो जाती है।

विशेषज्ञों की राय – पुनर्वास की व्यवस्था करना प्रशासन का कर्तव्य

विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी और वन क्षेत्रों में भूमि अधिकारों का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। अक्सर लोग बिना कागजात के वर्षों यहाँ रहते आ रहे होते हैं। ऐसे में अचानक की गई कार्रवाई से पूरे परिवार की जिंदगी अस्त-व्यस्त हो जाती है। वन अधिकार कानून के तहत ऐसे परिवारों के अधिकारों पर विचार करना जरूरी होता है।

एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा – “विकास के नाम पर गरीबों को बेघर करना उचित नहीं है। प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि अगर किसी को बेदखल करना ही है, तो पहले उसे वैकल्पिक व्यवस्था दी जाए। खुले आसमान के नीचे छोड़ देना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है।”

स्थानीय संगठनों ने मांगी निष्पक्ष जांच

इस मामले में अब स्थानीय सामाजिक संगठन और मानवाधिकार समूह सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने मांग की है कि प्रभावित परिवारों के अधिकारों की निष्पक्ष जांच की जाए। यदि परिवारों के पास भूमि से जुड़े कोई पुराने दस्तावेज या अधिकार हैं, तो उन्हें सुना जाए। अगर जमीन सरकारी है, तो भी प्रभावित परिवारों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्रवाई से पहले प्रशासन ने उन्हें सुनने की जहमत नहीं उठाई। जिससे नाराजगी और बढ़ी है।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। प्रभावित परिवार खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने को मजबूर हैं। स्थानीय लोगों के बीच रोष है और वे आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। अब देखना है कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है – क्या प्रभावित परिवारों को राहत मिलेगी या फिर यह संघर्ष और गहरेगा।

जमीन का सवाल, जिंदगी का सवाल

मालगांव की घटना केवल भूमि विवाद का मामला नहीं है। यह उस बुनियादी सवाल से जुड़ा है कि क्या विकास के नाम पर गरीबों को बेघर करना जायज़ है? और क्या प्रशासन की कार्रवाई में मानवीय संवेदनाएँ पूरी तरह गायब हो गई हैं? फिलहाल उम्मीद यही की जा सकती है कि इस मामले में न्याय हो, प्रभावित परिवारों को उनके अधिकार मिलें, और भविष्य में ऐसी कार्रवाइयों से पहले प्रशासन पुनर्वास और सुनवाई को प्राथमिकता देगा। तब तक, मालगांव के बेघर परिवार उम्मीद की राह देख रहे हैं। कि शायद कल का दिन उनके लिए कुछ बेहतर हो।

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