दुर्ग जिले के सरकारी जिला अस्पताल की मॉर्चुरी (शवगृह) की तस्वीर इन दिनों बेहद दयनीय है। यहाँ शवों को संरक्षित रखने वाला एक फ्रीजर कैबिनेट पिछले करीब पाँच महीनों से खराब पड़ा है। इसकी वजह से अस्पताल में मिलने वाली आठ में से सिर्फ चार शवों को ही सुरक्षित रखा जा सकता है। जब शवों की संख्या बढ़ जाती है, तो मृतकों को फ्रीजर के बाहर रखने की नौबत आ जाती है। हाल ही में एक नवजात शिशु के शव को कार्टन पर रखना पड़ा, जिसने इस बदहाल व्यवस्था को उजागर कर दिया। अब इस मामले में जिला कांग्रेस ने अस्पताल प्रशासन को 15 दिन का अल्टीमेटम दे दिया है।
क्या है पूरा मामला?
दुर्ग जिला अस्पताल की मॉर्चुरी में दो फ्रीजर कैबिनेट हैं। हर कैबिनेट में चार शव रखे जा सकते हैं, यानी कुल क्षमता आठ शवों की थी। लेकिन एक कैबिनेट लगभग पाँच महीने पहले खराब हो गया और तब से उसकी मरम्मत नहीं हुई। अब केवल एक कैबिनेट काम कर रहा है, जिसमें चार से अधिक शव नहीं रखे जा सकते। जब अधिक शव आते हैं, तो अस्पताल कर्मचारी परेशान हो जाते हैं। कई बार शवों को फर्श पर या कार्टन पर रखना पड़ता है। गर्मी के मौसम में ऐसे शवों से बदबू फैलने लगती है, जिससे पूरा परिसर दुर्गंध से भर जाता है।
नवजात का शव कार्टन पर रखा गया
हाल ही में नेवई क्षेत्र से एक अज्ञात नवजात का शव मिला था। जब उसे मॉर्चुरी लाया गया, तो पर्याप्त जगह नहीं थी। फ्रीजर खराब था और दूसरा पहले से भरा हुआ। मजबूरन उस मासूम के शव को एक कार्टन पर रखना पड़ा। गर्मी और उचित शीत व्यवस्था के अभाव में शव से दुर्गंध आने लगी। अस्पताल में आने-जाने वाले मरीजों के परिजन, कर्मचारी और पोस्टमार्टम स्टाफ सब परेशान हो गए। कई लोगों ने तो मॉर्चुरी के पास से गुजरने से ही मना कर दिया।
लोग वसूली का भी लगा रहे आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मॉर्चुरी में शव रखने के लिए रेडक्रॉस समिति के माध्यम से 300 रुपये तक का शुल्क लिया जाता है। शवों की संख्या बढ़ने पर यह रकम और भी बढ़ जाती है। लोगों का कहना है कि जब इतना शुल्क लिया जा रहा है, तो बुनियादी सुविधाएँ क्यों नहीं हैं? एक परिजन ने दर्द भरे स्वर में कहा – “हम पहले से दुखी हैं, ऊपर से मॉर्चुरी की दुर्गंध और व्यवस्था का ताना-बाना देखकर मन और टूट जाता है।”
कांग्रेस ने क्या किया? दिया 15 दिन का अल्टीमेटम
इस बदहाली के खिलाफ अब विपक्ष सड़क पर उतर आया है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का एक प्रतिनिधिमंडल शनिवार को जिला अस्पताल पहुंचा। उन्होंने सिविल सर्जन डॉ. आशीषयन मिंज से मुलाकात कर अपनी नाराजगी जताई और तुरंत नए फ्रीजर कैबिनेट लगाने की मांग की।
प्रतिनिधिमंडल ने मॉर्चुरी का निरीक्षण भी किया। उनका दावा है कि निरीक्षण के दौरान कुछ शव मॉर्चुरी के बाहर रखे मिले और वहाँ से दुर्गंध आ रही थी। कांग्रेस नेताओं ने इसे मानवीय संवेदनाओं के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि यदि 15 दिनों के भीतर नया फ्रीजर नहीं लगाया गया और व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो वे व्यापक आंदोलन करेंगे। साथ ही, स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन से भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की गई है।
अस्पताल प्रशासन ने क्या कहा?
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि उन्होंने समस्या को गंभीरता से लिया है और जल्द से जल्द नया फ्रीजर कैबिनेट लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। एक अधिकारी ने बताया कि तकनीकी कारणों और बजट जारी होने में देरी के कारण मरम्मत में वक्त लग गया, लेकिन अब जल्द ही कार्रवाई की जाएगी। हालाँकि, अभी तक कोई ठोस समयसीमा सामने नहीं आई है। कांग्रेस के अल्टीमेटम के बाद अब प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिना शीत व्यवस्था के मॉर्चुरी में रखे गए शवों से संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। गर्मियों में तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। शव से पैदा होने वाली दुर्गंध से मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की परेशानियाँ हो सकती हैं। अस्पताल के मरीज, तीमारदार और कर्मचारी सब इससे प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मॉर्चुरी जैसी संवेदनशील जगह पर लापरवाही बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल जिला अस्पताल की मॉर्चुरी की बदहाली और कांग्रेस के अल्टीमेटम ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि अस्पताल प्रशासन 15 दिनों में कितनी जल्दी और गंभीरता से कार्रवाई करता है। क्या नया फ्रीजर कैबिनेट लगाया जाएगा? क्या मॉर्चुरी में साफ-सफाई और दुर्गंध पर नियंत्रण होगा?
यह सिर्फ एक खराब फ्रीजर का मामला नहीं है। यह उस मानवीय गरिमा का सवाल है, जिसे मौत के बाद भी बनाए रखना हमारा कर्तव्य है। जब एक नवजात के शव को कार्टन पर रखना पड़े, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था बहुत गहरे संकट से गुजर रही है। अब प्रशासन को सिर्फ वादे नहीं, बल्कि हकीकत बदलनी होगी। तभी मृतकों के सम्मान और जीवितों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।

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