गरियाबंद। आज के दौर में जब देश मंगल मिशन और डिजिटल इंडिया की बात कर रहा है, तब भी छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के 48 गांव सदियों पुराने अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। यहाँ बिजली का नामोनिशान नहीं है। और इस पीड़ा को सत्ता के सबसे ऊँचे शिखर तक पहुँचाने के लिए ग्रामीणों ने एक अनूठा और दिल दहला देने वाला कदम उठाया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने ही खून से करीब 500 पत्र लिखकर भेजे हैं।
“हमारा खून भी पानी से ज्यादा गहरा है, बस हमें बिजली चाहिए”
एक ग्रामीण ने आंखों में आंसू लिए बताया – “हम खून से इसलिए लिख रहे हैं, क्योंकि अब और ज्यादा जेब नहीं बची है। हमारे बच्चे ढिबरी के उजाले में पढ़ते हैं, बीमार होने पर रात में इलाज नहीं मिलता, और मोबाइल तो सिर्फ नाम का है – नेटवर्क के लिए पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है।” ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन से शिकायत की, लेकिन हर बार उन्हें “जल्द ही” कहकर टाल दिया गया। अब उनके धैर्य की सीमा टूट चुकी है।
बिजली का प्रोजेक्ट अटका, वजह है अभ्यारण्य के नियम
जानकारी के मुसबित, यह पूरा मामला गरियाबंद के उन इलाकों से जुड़ा है, जो वन्यजीव अभ्यारण्य के नजदीक हैं। प्रशासन का कहना है कि यहाँ बिजली लाइन बिछाने के लिए पर्यावरणीय मंजूरी, वन विभाग की अनुमति और वाइल्डलाइफ क्लियरेंस जैसी कई औपचारिकताएँ जरूरी होती हैं। यही वजह है कि कई साल पहले बनी यह योजना अब तक अधूरी पड़ी है।
लेकिन ग्रामीण अब यह नहीं मानते कि इतने लंबे समय में इन मंजूरियों को नहीं लिया जा सकता था। उनका कहना है – “हम जंगल के जानवरों को नहीं मारते, हम उनके साथ रहते हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि हमारे घरों में बिजली का बल्ब जले। क्या यह इतनी बड़ी अपराध है?”
“अब सिर्फ PM ही हमें बचा सकते हैं”
ग्रामीणों का मानना है कि अब केवल प्रधानमंत्री ही उनकी समस्या सुन सकते हैं। उन्होंने खून से पत्र लिखकर अपनी पीड़ा को उस तरह से लिखा जैसे कोई आखिरी सांस लेने से पहले अपनी मर्जी लिखता है। एक ग्रामीण ने कहा – “हमारे पास स्याही नहीं थी, लेकिन हमारी रगों में खून था। हमने वही स्याही बना दिया। यह हमारी आखिरी उम्मीद है।”
प्रशासन क्या कहता है?
जिला प्रशासन का कहना है कि उन्होंने पत्र मिलने के बाद मामले को गंभीरता से लिया है और संबंधित विभागों से समन्वय किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, जिन 48 गांवों में बिजली नहीं है, वहां परियोजना को मंजूरी मिलनी बाकी है। जैसे ही पर्यावरणीय मंजूरी मिलती है, काम शुरू कर दिया जाएगा।
लेकिन ग्रामीण अब केवल “मंजूरी” और “प्रक्रिया” के शब्द सुनते-सुनते थक चुके हैं। उन्हें अब ठोस कार्रवाई चाहिए, न कि नए वादे।
विकास और पर्यावरण के बीच उलझी जद्दोजहद
यह मामला आज भारत के कई वनांचल क्षेत्रों की कहानी है। एक तरफ पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों की सुरक्षा का संवैधानिक दायित्व है, तो दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं से वंचित आदिवासी समुदायों का अस्तित्व और उनका विकास। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए एक समग्र नीति की आवश्यकता है, न कि हर योजना को अटकाने की परंपरा।
आखिरी उम्मीद, आखिरी कोशिश
ग्रामीणों का यह कदम किसी राजनीतिक दबाव का हिस्सा नहीं है। यह उस बुनियादी सवाल का प्रतीक है जो हर नागरिक को अपने लोकतंत्र से पूछने का अधिकार है – क्या सिर्फ इसलिए कि हम जंगल में रहते हैं, हम अंधेरे में रहने को अभिशप्त हैं?
खून से लिखे 500 पत्र अब प्रधानमंत्री कार्यालय पहुँच चुके हैं। कहा जा रहा है कि पत्रों में ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा को ऐसे शब्दों में उकेरा है कि पढ़ते ही सिहरन हो जाती है। एक पत्र में लिखा था – “सर, हम भी आपके ही परिवार हैं, बस थोड़ा सा उजाला हमारे घरों तक पहुँचा दीजिए।”
अब देखना यह है कि इस पीड़ा की पुकार सत्ता के उस कमरे तक पहुँचती है या नहीं – जहाँ देश के लाखों-करोड़ों लोगों के सपनों का भविष्य तय होता है। फिलहाल, 48 गांवों के ये लोग अपने घरों की ढिबरी और लालटेन के सहारे एक और रात गुजारने को मजबूर हैं। और आसमान में बादलों के बीच कहीं टिमटिमाता तारा भी उनके लिए उम्मीद से कम नहीं है – कि शायद इस बार सच में कोई उनका दरवाजा खटखटाए, उजाला लेकर।

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