भारत में आरक्षण – किसे मिलता है, कितना मिलता है, और क्यों? (बिल्कुल साफ और सीधी भाषा में)
आरक्षण (Reservation) को लेकर पूरे देश में बहस होती रहती है। कोई कहता है यह जरूरी है, कोई कहता है इससे मेरिट खत्म हो रही है। लेकिन सच यह है कि आरक्षण आजादी के बाद से ही हमारे समाज और संविधान का हिस्सा रहा है।
पहले यह समझ लेते हैं कि आखिर आज के समय में कौन-कौन से समुदाय इसका हकदार हैं, फिर जानेंगे कि कितना फायदा मिलता है और किन जगहों पर मिलता है।
सबसे पहले: किन समुदायों को आरक्षण मिलता है?
1. SC – अनुसूचित जाति (Scheduled Castes)
> कौन हैं ये?
वे जिन्हें पहले "अछूत" या "दलित" कहा जाता था। सालों-साल ये लोग सामाजिक भेदभाव का शिकार बने रहे। उन्हें मंदिर में नहीं जाने दिया जाता था, उनके कुएं से पानी नहीं पिया जाता था, उनके साथ बराबरी का व्यवहार नहीं किया जाता था।
> क्यों दिया गया आरक्षण?
ताकि इन्हें शिक्षा, नौकरी और राजनीति में बराबरी का मौका मिल सके। डॉ. अंबेडकर ने इसी सोच के साथ SC के लिए आरक्षण की व्यवस्था रखी। यह आरक्षण सामाजिक बहिष्कार और अत्याचार के इतिहास को सुधारने के लिए है।
2. ST – अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes)
> कौन हैं ये?
हमारे आदिवासी भाई-बहन। ये लोग अक्सर जंगलों और दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। सालों तक इनके पास सड़क नहीं थी, स्कूल नहीं था, अस्पताल नहीं था।
> क्यों दिया गया आरक्षण?
क्योंकि सदियों से ये समाज की मुख्यधारा से कटे रहे। आजादी के वक्त ये लोग बेहद पिछड़े हालात में थे। इसलिए उन्हें भी शिक्षा, नौकरी और राजनीति में आगे बढ़ने का मौका दिए जाने की जरूरत पड़ी।
3. OBC – अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes)
> कौन हैं ये?
ये वे जातियाँ हैं जो न तो SC/ST की श्रेणी में आती हैं और न ही सामान्य वर्ग (General) जिनके पास सब कुछ उपलब्ध है। इनमें कई ऐसी जातियाँ शामिल हैं जो ऐतिहासिक रूप से कम पढ़ी-लिखी थीं, कमज़ोर थीं, और सरकारी नौकरियों में उनका रिप्रेजेंटेशन बहुत कम था।
> क्यों दिया गया आरक्षण?
1990 के दशक में मंडल कमीशन (Mandal Commission) की सिफारिश के बाद OBC को नौकरियों और शिक्षा में 27% आरक्षण मिलना शुरू हुआ। यह आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन दूर करने के लिए दिया गया।
4. EWS – आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (Economically Weaker Section)
> कौन हैं ये?
सामान्य वर्ग के वे लोग जो आर्थिक रूप से गरीब हैं, लेकिन किसी भी SC/ST/OBC श्रेणी में नहीं आते। उदाहरण के लिए, कोई ब्राह्मण या राजपूत परिवार अगर बेहद गरीब है, तो वह EWS के तहत आरक्षण का लाभ ले सकता है।
> क्यों दिया गया आरक्षण?
यह सबसे नया जोड़ा गया आरक्षण है। 2019 में संविधान में 103वें संशोधन के तहत General वर्ग के गरीबों को 10% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। पहले आरक्षण सिर्फ जाति-आधारित था, अब आर्थिक आधार भी जुड़ गया।
अब जानते हैं कि इन्हें कितना-कितना फायदा मिलता है?
केंद्र सरकार के सरकारी कॉलेजों, यूनिवर्सिटी, और केंद्रीय नौकरियों में लगभग यह छूट है:
SC – 15%
ST – 7.5%
OBC – 27%
EWS – 10%
> कुल आरक्षण = 49.5% से लेकर 50% के करीब
यह 50% की सीमा सुप्रीम कोर्ट के इंद्र साहनी केस (1992) में तय की गई थी। कोर्ट ने कहा था कि बहुत ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता, लेकिन कई राज्य (जैसे तमिलनाडु, बिहार) अपने राज्य स्तर पर 69% तक भी दे रहे हैं।
किन-किन जगहों पर मिलता है आरक्षण?
तीन जगहों पर:
शिक्षा में – सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटी, सरकारी स्कूल।
सरकारी नौकरियों में – केंद्र सरकार की जॉब्स और राज्य सरकार के विभागों का भर्ती।
राजनीति में – संसद (लोकसभा, राज्यसभा) और विधानसभाओं में SC/ ST के लिए reserved सीटें हैं। यानी कुछ संसदीय सीटों पर केवल SC/ST के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं।
आरक्षण क्यों दिया जाता है? उद्देश्य क्या है?
> तीन मुख्य लक्ष्य हैं:
सामाजिक न्याय (Social Justice) – उन समुदायों को आगे बढ़ाने का मौका, जिनके साथ सदियों से अन्याय हुआ।
प्रतिनिधित्व (Representation) – सरकारी नौकरियों और विधानमंडलों में हर वर्ग को बराबरी की हिस्सेदारी मिले।
ऐतिहासिक भेदभाव सुधारना (Historical Remedy) – ताकि पिछड़ापन खत्म हो और हाशिए पर खड़े लोग भी आगे आएं।
Reservation vs Merit: बहस क्या है?
जो समर्थन करते हैं वो कहते हैं: बिना आरक्षण के दलित, आदिवासी और पिछड़े कभी सामान्य वर्ग के साथ बराबरी पर नहीं आ सकते।
जो विरोध करते हैं वो कहते हैं: इससे सही प्रतिभा को (Merit) को नुकसान पहुंचता है। अच्छे नंबर वाला विद्यार्थी पीछे रह जाता है, कम नंबर वाला आरक्षण के कारण आगे निकल जाता है।
सच क्या है?
यह अब भी भारत का सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा है। एक वर्ग को अपना शोषण याद है, दूसरे को अपनी मेरिट का दर्द।
सारांश:
भारत का आरक्षण शुरुआत में पूरी तरह से जाति और सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित था। 2019 के बाद आर्थिक आधार (EWS) भी जुड़ चुका है।
SC, ST और OBC → सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण।
EWS → सिर्फ आर्थिक गरीबी के आधार पर (सामान्य वर्ग के लिए)।
लक्ष्य एक ही है – जो पीछे रह गए, उन्हें आगे बढ़ने का मौका देना।
नोट: हर राज्य का अपना आरक्षण फॉर्मूला होता है। यह 15%, 7.5%, 27% का आंकड़ा केंद्र सरकार के स्तर की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों के लिए है। राज्य सरकारें (बिहार, तमिलनाडु, राजस्थान) अपने स्तर पर अलग प्रतिशत दे सकती हैं।
अलग-अलग राज्यों में आरक्षण – कहाँ कितना, किसको, और क्यों?
पिछली बात हमने समझी थी कि केंद्र सरकार में आरक्षण 49.5% के आसपास है। लेकिन जैसे ही State Government की बात आती है, नियम थोड़ा बदल जाता है।
हर राज्य अपनी यहाँ की आबादी, इतिहास और राजनीति के हिसाब से आरक्षण का फैसला करता है। यही वजह है कि:
कहीं 50% के करीब रहता है (महाराष्ट्र, बिहार)
कहीं तो 50% से 60% या 70% तक पहुँच जाता है (तमिलनाडु, राजस्थान)
आइए, राज्य-दर-राज्य समझते हैं क्या चल रहा है।
1. तमिलनाडु – जहाँ आरक्षण 69% है (देश में सबसे ज्यादा)
सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन तमिलनाडु में लगभग 69% सीटों पर आरक्षण लागू है।
यहाँ OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) और MBC (सबसे पिछड़ा वर्ग) की आबादी बहुत बड़ी है – लगभग 80% के करीब। यही वजह है कि राज्य सरकार इतना बड़ा हिस्सा उन्हें देती है।
इसमें SC और ST भी जुड़ जाते हैं।
अब सवाल उठता है – सुप्रीम कोर्ट ने 50% की सीमा तो तय कर रखी है, तो तमिलनाडु कैसे बचा हुआ है?
जवाब: उन्होंने इस आरक्षण कानून को संविधान की 9वीं अनुसूची (9th Schedule) के तहत रख छोड़ा है। 9वीं अनुसूची उन कानूनों को अदालत की सीधी निगरानी से बचा देती है। इसलिए तमिलनाडु अभी तक 69% पर अपनी सरकार चला रहा है। यह अपवाद है, नियम नहीं।
2. महाराष्ट्र – 50% की सीमा के साथ मराठा आरक्षण का झगड़ा
महाराष्ट्र मोटे तौर पर 50% की सीमा में ही रहा है। SC, ST, OBC को सामान्य आरक्षण मिलता है।
पर यहाँ सबसे बड़ा विवाद Maratha समुदाय के आरक्षण को लेकर छिड़ा था। 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने मराठाओं को 16% का अलग आरक्षण दे दिया, जिससे कुल आरक्षण 68% हो गया था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में उसे रद्द कर दिया। 50% सीमा को फिर से लागू करते हुए कोर्ट ने कहा – मराठा समुदाय आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत है, वह OBC या EWS नहीं है, इसलिए उसे आरक्षण की जरूरत नहीं।
फिलहाल: महाराष्ट्र में अब मराठा आरक्षण नहीं है, और वे वापस 50% पर आ रहे हैं। लेकिन मराठा समुदाय फिर से अपनी माँग उठा रहा है, इसलिए मामला कोर्ट में लटका हुआ है।
3. राजस्थान – 64% से गिरकर 50% के भीतर
राजस्थान एक समय 64% आरक्षण तक पहुँच गया था। यहाँ SC, ST, OBC और EWS के साथ Gujjar समुदाय के लिए अलग से आरक्षण देने की कोशिश की गई थी।
Gujjar समुदाय ने सड़कें जाम करने, जलसा करने और हड़ताल करने तक का आंदोलन किया।
अदालत ने साफ कहा – 50% से ऊपर नहीं जा सकते। Gujjar को ST (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा देने के पीछे राजनीतिक दबाव है, उनके पास कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
अब राजस्थान अपने आरक्षण को 50% के आसपास ही रखता है। हालाँकि अभी भी कभी-कभी विशेष कानून लाकर इसे बढ़ाने की कोशिश होती है, लेकिन वह कोर्ट में टिक नहीं पाती।
4. बिहार – 50% पर, लेकिन बढ़ाने की तैयारी
बिहार में अभी 50% के आसपास आरक्षण है। यहाँ OBC और EBC (Extremely Backward Classes) के लिए अलग से आरक्षण बनाया गया है।
जाति सर्वेक्षण (Caste Census) हुआ और उसमें पिछड़ों की आबादी लगभग 80% होने की बात सामने आई। इसके बाद नीतीश कुमार और राजनीतिक दल लगातार आरक्षण बढ़ाने की माँग कर रहे हैं।
उनका कहना है – 1992 का 50% वाला सूत्र अब पुराना हो चुका है। 21वीं सदी में पिछड़ों को और समाधान चाहिए।
फिलहाल कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, लेकिन केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनता रहता है।
5. कर्नाटक – 50% के करीब, लिंगायत पर राजनीति
कर्नाटक भी 50% की सीमा के करीब ही काम करता है। लेकिन यहाँ Lingayat और Vokkaliga जैसी शक्तिशाली जातियों को OBC में शामिल करने की राजनीति हमेशा गर्म रहती है।
2019 में पूर्व सरकार ने पूरे लिंगायत समुदाय को अलग धार्मिक दर्जा देने और उन्हें OBC आरक्षण देने की कोशिश की, लेकिन यह कानूनी अड़चनों में फँस गया।
अब ये समुदाय OBC की सीमित सूची में आते हैं, बिना किसी अतिरिक्त बढ़ोतरी के।
6. झारखंड / छत्तीसगढ़ – आदिवासियों (ST) को ज्यादा फायदा
इन राज्यों में ST (अनुसूचित जनजाति) आबादी बहुत ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर:
झारखंड में ST को 26% तक आरक्षण मिलता है।
इसके अलावा SC और OBC का अलग आरक्षण होता है, जिससे कुछ संस्थानों में कुल आरक्षण 60% तक पहुँच जाता है।
हालाँकि सरकारी तौर पर वे 50% की सीमा मानते हैं, लेकिन आदिवासी बहुल इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में असल आरक्षण चढ़ के जाता है, क्योंकि वहाँ सवर्ण बहुत कम हैं।
इतना फर्क क्यों है? तीन बड़े कारण:
जनसंख्या composition: जिस राज्य में पिछड़ी जातियाँ (OBC/ST/MBC) ज्यादा हैं, वहाँ आरक्षण भी अधिक मिलता है। तमिलनाडु में पिछड़े वर्ग की आबादी 80% से अधिक है, इसलिए उसे 69% आरक्षण मिलता है।
आंदोलन का दबाव: जहाँ विशेष समुदाय (Gujjar, Maratha, Jat) ने करीने से आंदोलन किया, वहाँ राज्य सरकारों ने राजनीतिक लाभ के लिए आरक्षण बढ़ाने की कोशिश की।
50% सीमा की कानूनी लड़ाई: सुप्रीम कोर्ट का 50% का नियम है, लेकिन तमिलनाडु ने उसे 9वीं अनुसूची (9th Schedule) के नीचे छुपा लिया। अन्य राज्य अभी 50% सीमा तो मानते हैं, लेकिन कोर्ट में जाकर उसे बढ़ाने या नियम ढीला करने की कोशिशें करते रहते हैं।
सीधी बात यह है – Union Government में सब जगह एक समान आरक्षण होता है, लेकिन State Government में अलग-अलग।
बॉटम लाइन (सबसे आखिरी सारांश)
भारत में Reservation uniform नहीं है।
केंद्र सरकार की जॉब, यूनिवर्सिटी, कॉलेज – सब लगभग इकसार होते हैं (JNU या Delhi University में 49.5%) ।
राज्य सरकार के स्कूल, कॉलेज, पुलिस, सरकारी नौकरियाँ – यहाँ हर राज्य अपना आंकड़ा खुद तय करता है।
तो कभी-कभी तमिलनाडु का छात्र 69% क्वॉटा में बैठता है, तो बिहार या महाराष्ट्र का छात्र उसी संस्थान में 50% क्वॉटा में। यही इस सिस्टम की सबसे बड़ी असमानता और बहस का विषय बना हुआ है।
"Creamy Layer" (मलाईदार परत) यानी OBC के बीच से अमीर लोगों को आरक्षण क्यों नहीं मिलता।"Creamy Layer" क्या है – और OBC में किन लोगों को आरक्षण नहीं मिलता?

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