नेपाल–भारत सीमा विवाद पर नया बयान: 'नेपाल ने भी अतिक्रमण किया' का सच क्या है?

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काठमांडू | 1 जून 2026

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने लिपुलेख-लिम्पियाधुरा-कालापानी क्षेत्रीय विवाद को लेकर संसद में अपना पहला बड़ा बयान दिया है। उन्होंने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए ब्रिटेन को भी बातचीत में शामिल करने की बात कही है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि "भारत ने नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण किया है, तो वहीं नेपाल ने भी भारत की जमीन पर अतिक्रमण किया है।" इस बयान ने नेपाल की राजनीति में ही हलचल मचा दी है, जिसके बाद विदेश मंत्रालय को सफाई देनी पड़ी है

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद नेपाल के पश्चिमी भाग में स्थित लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा इलाकों को लेकर है। नेपाल का दावा है कि 1816 की सुगौली संधि (Sugauli Treaty) के अनुसार ये क्षेत्र उसके हैं, जबकि भारत का कहना है कि ये उत्तराखंड राज्य का हिस्सा हैं और ये दावे "ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं" हैं

 नेपाल के पीएम बालेन शाह ने क्या कहा?

  1. ब्रिटेन को शामिल करने की बात: पीएम शाह ने कहा कि यह विवाद ब्रिटिश काल का है, इसलिए इसे सुलझाने में ब्रिटेन की भी दिलचस्पी होनी चाहिए। नेपाल ने इस मामले को लेकर भारत और चीन के साथ-साथ ब्रिटेन को भी राजनयिक पत्र भेजा है। उन्होंने कहा, "ब्रिटिश इंडिया के जाते समय यह समस्या आने वाली पीढ़ियों को दे दी गई थी, इसलिए हम मानते हैं कि इंग्लैंड को भी इस बारे में चिंतित होना चाहिए।"

  2. बातचीत से समाधान: शाह ने जोर देकर कहा कि इस मुद्दे का समाधान "टेबल टॉक" (मेज पर बैठकर बातचीत) और कूटनीति के जरिए ही होगा। उन्होंने बताया कि भारत ने नेपाल के राजनयिक पत्र का जवाब दे दिया है, और दोनों देश इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और विशेषज्ञों की टीम बनाकर बातचीत के जरिए समाधान निकालने पर सहमत हुए हैं

विवादास्पद बयान: "नेपाल ने भी भारत की जमीन पर अतिक्रमण किया"

यह बयान सबसे चर्चा में रहा। पीएम शाह ने संसद में कहा, "प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि न केवल भारत ने नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण किया है, बल्कि कई जगहों पर नेपाल ने भी भारत की जमीन पर अतिक्रमण किया है।" उन्होंने कहा कि दोनों देशों को इस मामले को मिल-बैठकर सुलझाना चाहिए

इस बयान के बाद नेपाल में ही विपक्ष ने हंगामा कर दिया और मांग की कि इसे संसद रिकॉर्ड से हटाया जाए या इसके सबूत पेश किए जाएं

तथ्य क्या कहते हैं? (नेपाल सरकार की सफाई)

इस विवाद को देखते हुए नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई देनी पड़ी। मंत्रालय ने स्पष्ट किया:

  • तकनीकी स्थिति: पीएम शाह का बयान "पार करने वाली जमीन" (Cross-Border Occupation) और "डसगजा" क्षेत्र (No-Man's Land) की तकनीकी वास्तविकता को देखते हुए था

  • सीमा पिलर की समस्या: कई जगहों पर सीमा पिलर नष्ट या गायब हैं। सर्वेक्षण में पता चला है कि कुछ स्थानों पर जिस जमीन पर आज नेपाली कब्जा है, वो तकनीकी रूप से भारत की हो सकती है, और जिस पर भारतीय कब्जा है, वो नेपाल की हो सकती है

  • नेपाल का रुख स्पष्ट: मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर नेपाल का पुराना रुख बरकरार है। ये क्षेत्र नेपाल के अभिन्न अंग हैं

🇮🇳 भारत का क्या रुख है?

भारत का रुख स्पष्ट और सुसंगत है:

  • ऐतिहासिक तथ्य: भारत का मानना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं हैं

  • लिपुलेख मार्ग: लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है

  • द्विपक्षीय वार्ता: भारत सीमा संबंधी मुद्दों को बातचीत के जरिए ही सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है

 क्या है बड़ा संकेत?

बालेन शाह, जो एक युवा और अपरंपरागत नेता हैं, का यह बयान इस पुराने मुद्दे पर एक नया दृष्टिकोण दिखाता है।

  1. ब्रिटेन को शामिल करना: यह एक नई कूटनीतिक चाल है, जो इस विवाद को एक नया अंतरराष्ट्रीय आयाम दे सकती है।

  2. सीमाओं का जटिल सच: शाह के बयान ने इस तथ्य को उजागर किया है कि इतने लंबे और पुराने बॉर्डर पर छोटे-मोटे कब्जे या तकनीकी विसंगतियाँ होना आम बात है।

  3. बातचीत पर जोर: सबसे अहम बात यह है कि दोनों देश इस मुद्दे को ऐतिहासिक दस्तावेजों और विशेषज्ञों के साथ मिलकर सुलझाने के लिए तैयार हैं।

फिलहाल, शाह के इस बयान ने मामले को गर्मा दिया है, लेकिन दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिए हल निकालने की राह भी साफ कर दी है। अब देखना यह होगा कि क्या ब्रिटेन इस मामले में दिलचस्पी लेता है और क्या ये 'टेबल टॉक' ठोस समाधान तक पहुंच पाती है।

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