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भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए आज एक ऐतिहासिक दिन है। हैदराबाद की स्टार्टअप कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस Skyroot Aerospace ने वह कर दिखाया जो अब तक कोई भारतीय निजी कंपनी नहीं कर पाई थी।
कंपनी ने करीब 60 मिलियन डॉलर (लगभग 570 करोड़ रुपए) का फंडिंग राउंड किया है, जिसके बाद उसकी वैल्यूएशन 1.1 बिलियन डॉलर यानी करीब 9,000 करोड़ रुपए हो गई है।
और इसी के साथ, स्काईरूट भारत का पहला स्पेस यूनिकॉर्न बन गया है।
यूनिकॉर्न क्या होता है? (थोड़ा ज्ञान भी दे लेते हैं)
देखिए, स्टार्टअप की दुनिया में "यूनिकॉर्न" उन कंपनियों को कहा जाता है जिनकी कीमत 1 बिलियन डॉलर (लगभग 8,000 करोड़ रुपए) से ज़्यादा होती है।
यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। स्काईरूट अब उसी लीग में खेल रहा है, जहाँ दुनिया की दिग्गज कंपनियाँ हैं।
स्काईरूट इस साल 2026 में भारत की चौथी यूनिकॉर्न कंपनी बनी है। लेकिन स्पेस सेक्टर में, यह पहली है। और यही बात इसे सबसे खास बनाती है।
स्काईरूट आखिर कर क्या रहा है? (आसान भाषा में)
तो ये स्काईरूट वाले असल में रॉकेट बनाते हैं। हाँ, ठीक सुना आपने।
यह कंपनी विक्रम साराभाई के नाम पर विक्रम सीरीज के रॉकेट बना रही है। पूरा नाम – विक्रम-1, विक्रम-2, वगैरह।
विक्रम-एस (Vikram-S): यह 2022 में लॉन्च हुआ था और भारत का पहला निजी कंपनी द्वारा बनाया गया रॉकेट था, जो स्पेस तक गया।
विक्रम-1 (Vikram-1): यह अब उनका असली ऑर्बिटल रॉकेट है। यानी यह सैटेलाइट को धरती की कक्षा (ऑर्बिट) में स्थापित करेगा। इसे अगले कुछ हफ्तों में लॉन्च किया जाना है।
यह रॉकेट कार्बन फाइबर से बना है (जो स्टील से 5 गुना हल्का होता है) और इसके इंजन 3D-प्रिंटेड हैं। यानी अत्याधुनिक तकनीक।
इतने पैसे किसने दिए और क्यों दिए? (गपशप वाला हिस्सा)
यह 60 मिलियन डॉलर का फंड शेरपालो वेंचर्स और सिंगापुर के सॉवरेन फंड GIC ने मिलकर दिया है। साथ ही, दुनिया की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी ब्लैकरॉक (BlackRock) ने भी इसमें पैसा लगाया है।
खास बात यह है कि शेरपालो वेंचर्स के फाउंडर राम श्रीराम हैं। ये वही शख्स हैं जो गूगल और अल्फाबेट के शुरुआती निवेशकों में से एक हैं। वो अब स्काईरूट की बोर्ड में भी आ रहे हैं। यानी जिन लोगों ने गूगल को दुनिया बनाया, अब वो स्काईरूट को स्पेस में भेज रहे हैं।
इतने सारे बड़े निवेशकों का भरोसा इसलिए है क्योंकि स्काईरूट तकनीकी रूप से बहुत आगे निकल चुका है। जैसे ही उनका विक्रम-1 मिशन सफल होता है, यह कंपनी पैसे कमाना शुरू कर देगी (बस अभी प्री-रेवेन्यू स्टेज पर है)।
यह कदम भारत के लिए क्यों है इतना बड़ा?
दोस्तों, यह सिर्फ एक कंपनी की सफलता नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक गेम-चेंजर मोमेंट है।
अब सिर्फ ISRO नहीं: अब स्पेस में भारत का नाम रोशन करना सिर्फ इसरो का काम नहीं रह गया है। अब निजी कंपनियाँ भी आगे आ रही हैं।
दुनिया को देंगे टक्कर: पहले छोटे सैटेलाइट लॉन्च कराने के लिए लोग SpaceX या यूरोप भागते थे। अब वो हैदराबाद आएंगे। स्काईरूट का विक्रम-1 350 किलोग्राम तक के सैटेलाइट्स को ले जा सकता है। यह बाजार बहुत बड़ा है।
"मेक इन इंडिया" का असली तड़का: हम अब रॉकेट तक बेचेंगे। स्काईरूट के 90% ग्राहक विदेशों (अमेरिका, यूरोप, साउथ-ईस्ट एशिया) से हैं। यानी इंडियन प्रोडक्ट का एक्सपोर्ट होगा।
आगे क्या होगा? (भविष्य की बातें)
अभी सबसे बड़ी नजर विक्रम-1 के लॉन्च पर है। इसके लिए रॉकेट को पहले ही श्रीहरिकोटा भेजा जा चुका है।
अगर विक्रम-1 सफल रहा, तो स्काईरूट अब हर महीने एक रॉकेट छोड़ने की तैयारी में जुट जाएगा। साथ ही इस पैसे से वे एक और भी ताकतवर रॉकेट विक्रम-2 बनाएंगे, जो 900 किलोग्राम तक पेलोड ले जा सकेगा।
निष्कर्ष – स्पेस बिजनेस अब आम हो गया है
तो दोस्तों, स्काईरूट का यूनिकॉर्न बनना भारत के स्पेस सेक्टर का सेक्युलर ब्रेकिंग इंटरनेशनल टूरिस्ट वाला मोमेंट है।
जिस तरह 90 के दशक में टेक्नोलॉजी के सपने आए, 2010 के दशक में स्टार्टअप्स की लहर आई, अब 2026 में स्पेस इकोनॉमी की उड़ान शुरू हो गई है।
भारत अब उन देशों की लीग में खेल रहा है, जहाँ रॉकेट बनाना कोई सरकारी काम नहीं, बल्कि एक बिजनेस मॉडल है। और स्काईरूट ने सबसे पहले वो छत तोड़ी है। अब देखते हैं, आगे क्या होता है।

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