किसी भी नीति का असर तब देखने को मिलता है, जब वह ज़मीन पर उतरती है। छत्तीसगढ़ में इस बार ऐसा ही हुआ है। सरकार ने शराब को कांच की बोतलों की जगह प्लास्टिक (पीईटी) बोतलों में बेचने का फैसला लिया था – मकसद था: नुकसान कम करना और सुरक्षा बढ़ाना। मगर यह फैसला इतना भारी पड़ा कि प्रदेशभर में सप्लाई चेन चरमरा गई है। रायपुर हो या फिर कोई छोटा जिला – हर जगह शराब की दुकानों पर स्टॉक के नाम पर ‘सूखा’ पड़ा है। उपभोक्ता परेशान हैं, दुकानदार बेचारे हाथ मल रहे हैं, और राजस्व को करोड़ों का नुकसान हो रहा है।
क्या था पूरा मामला? फैसला क्यों लिया गया?
आबकारी नीति के तहत सरकार ने यह बदलाव किया। तर्क दिया गया कि कांच की शीशियाँ तोड़ने में बहुत परेशानी होती है, अक्सर लोगों को चोट लग जाती है, और परिवहन के दौरान बोतलें टूट जाती हैं, जिसका नुकसान बेचारे व्यापारी उठाते थे। प्लास्टिक की बोतलें आती हैं – हल्की, मजबूत, और ले जाने में आसान। लेकिन “जितनी सोच थी उतनी आसानी ज़मीन पर नहीं दिखी।”
असली समस्या क्या है? – दिक्कत सप्लाई चेन में है
नई व्यवस्था लागू होते ही एक बात तुरंत साफ हो गई – हम तैयार नहीं थे। आइए समझते हैं क्या-क्या गड़बड़ हुई:
बोतलों की कमी: डिस्टिलरी को हजारों की संख्या में प्लास्टिक बोतलों की ज़रूरत थी, लेकिन सप्लायर इतनी मात्रा में अचानक नहीं दे पाए।
महंगा कच्चा माल: प्लास्टिक (पॉलीमर) के दाम पहले से ही आसमान पर थे। उस पर अचानक इतनी डिमांड – तो लागत चरम पर जा पहुंची।
प्रॉडक्शन में रुकावट: कई बॉटलिंग यूनिट्स ने काम करना बंद कर दिया, क्योंकि उनके पास सही पैकेजिंग मटीरियल ही नहीं था।
नतीजा? सप्लाई चेन की कड़ियाँ एक-एक कर टूट गईं। प्रदेश में जितनी शराब बिकनी चाहिए थी, उसका करीब एक-तिहाई भी बाजार तक नहीं पहुँच रहा है।
दुकानों का नज़ारा: सुबह खुलीं, दोपहर तक खाली
राज्य की सैकड़ों शराब दुकानों का हाल यह है कि जैसे ही सुबह दुकान खुलती है, लोगों की लाइन लग जाती है। कुछ ही घंटों में सारा स्टॉक खत्म। शाम होते-होते ज्यादातर दुकानों के शटर गिर जाते हैं।
रायपुर के एक दुकानदार ने बताया – “पहले हफ्ते में तीन बार स्टॉक आता था, अब आता ही नहीं है। ग्राहक आ रहे हैं, हाथ जोड़कर वापस जा रहे हैं। रोज़ का मुनाफा तो गया, अब तो बस नाम का धंधा चल रहा है।”
राजस्व का गणित: करोड़ों का नुकसान पहले ही दर्ज
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में शराब की बिक्री से आबकारी विभाग को अरबों का राजस्व मिलता है। लेकिन इस नीति ने उस सेहत को भी झकझोर दिया है।
पिछले हफ्ते भर में देसी और सस्ती अंग्रेजी शराब (IMFL) की बिक्री में 40% से ज्यादा की गिरावट आई है।
प्रतिदिन करीब 5 से 7 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हो रहा है।
शादी का सीजन चल रहा है – जिस समय डिमांड सबसे ज्यादा होती है, उस समय सप्लाई ही गायब है।
असर यह हुआ कि जो लोग सस्ती शराब पीते थे, वे अब महंगी ब्रांड या बीयर पर शिफ्ट हो रहे हैं। यानी उपभोक्ता की जेब पर तो बोझ बढ़ा ही, साथ में बाजार का संतुलन भी बिगड़ गया है।
उत्पादन का संकट: कंपनियाँ भी हैं परेशान
सप्लाई के इस जाम में सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि बड़ी शराब कंपनियाँ भी फंसी हुई हैं। बॉटलिंग यूनिट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती है – प्लास्टिक बोतल बनाने वाली मशीनों की कमी और कच्चे माल की ऊंची कीमत।
एक निजी डिस्टिलरी के मैनेजर ने बताया:
“हम प्लास्टिक बोतलों पर स्विच करना चाहते हैं, लेकिन अच्छे क्वालिटी वाली बोतलें ही नहीं मिल रही। और अगर मिल भी जाए, तो लागत इतनी ज्यादा है कि शराब का दाम दोगुना करना पड़ेगा।”
कई कंपनियां अब अपना खुद का प्लास्टिक बोतल प्लांट लगाने का मन बना रही हैं, लेकिन यह समाधान महीनों में नहीं होगा – इसमें समय और भारी पूंजी दोनों चाहिए।
बीच-बचाव: फिर से कांच की बोतलों पर आया दम
हालात इतने बिगड़े कि अंततः आबकारी विभाग को बीच का रास्ता निकालना पड़ा। कुछ ब्रांड्स के लिए अस्थायी तौर पर फिर से कांच की बोतलों में बॉटलिंग की अनुमति दे दी गई।
लेकिन यह तो महज़ ‘बैंडेज़ सॉल्यूशन’ है, यानी घाव पर पट्टी। जब तक प्लास्टिक बोतलों की सप्लाई चेन पूरी नहीं हो जाती, तब तक बाजार अधूरा ही रहेगा।
सरकार क्या कह रही है?
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि ये “शुरुआती समस्याएँ” हैं, और धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, लंबे समय में प्लास्टिक बोतलें ज्यादा सुरक्षित और कुशल हैं। एक वरिष्ठ आबकारी अधिकारी के अनुसार:
“हम डिस्टिलरीज के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। एक बार बोतल सप्लायर अपनी क्षमता बढ़ा लेंगे, सब सामान्य हो जाएगा।”
लेकिन अभी के लिए, आम आदमी को इस राहत का इंतज़ार है।
जनता का गुस्सा और अवैध कारोबार की आशंका
बाजार में शराब न मिलने से यह खतरा भी बढ़ गया है कि कहीं अवैध या नकली शराब न बिकने लगे। छत्तीसगढ़ में पहले भी कई बार नकली शराब से होने वाली मौतों की खबरें आ चुकी हैं। हो सकता है कि देसी दारू के भूखे लोग अब ब्लैक में सप्लाई ढूंढने लगें।
ग्राहकों की नाराज़गी साफ दिखती है – एक युवा ने गुस्से से कहा, “सरकार पहले सोचती तो बाद में फैसला लेती। अब अचानक बदलाव करके सबको तंग कर दिया है।”
क्या सीख देता है यह मामला?
छत्तीसगढ़ में प्लास्टिक बोतलों का यह प्रयोग एक बड़ा सबक है – किसी भी बड़े नीतिगत बदलाव के लिए तैयारी, संसाधन और समय, तीनों ज़रूरी हैं। थोड़ी-सी जल्दबाजी पूरे सिस्टम को चरमरा सकती है। पहले यह तय करना चाहिए था कि इतनी सारी बोतलें आएँगी कहाँ से? क्या दाम स्थिर रहेंगे? क्या उत्पादन बिना रुके हो सकेगा?
अब देखना यह है कि सरकार इस संकट से उबरने में कितनी सफल रहती है। फिलहाल तो प्लास्टिक का फैसला प्लास्टिक की तरह ही लचीला साबित हुआ – जैसा सोचा था, वैसा नहीं हुआ।
छत्तीसगढ़ में अभी हर तरफ बस एक ही नारा सुनाई दे रहा है – “शराब है कि नहीं?” दुकानदार पसोपेश है, कंपनियाँ मशक्कत में हैं, सरकार सफाई देने में जुटी है, और उपभोक्ता परेशान है। एक तरफ कांच की बोतलों के टूटने का डर, दूसरी तरफ प्लास्टिक की पहुँच का अभाव। बीच में फंसी सप्लाई चेन हर किसी को रुला रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही सबक लेकर व्यवस्था को सही किया जाएगा। नहीं तो आने वाले दिनों में यह संकट और गहरा सकता है।

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