भारत के पास 60 दिन का तेल तो है, लेकिन कंपनियों को रोज़ ₹1000 करोड़ का नुकसान – सरकार ने दी चेतावनी

 


पश्चिम एशिया (जहां ईरान-इज़राइल के बीच तनातनी चल रही है) के बढ़ते तनाव के बीच भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक लंबी सांस भरी है, तो कुछ चिंता भी जताई है।

अच्छी खबर यह है कि देश के पास फिलहाल 60 दिनों का कच्चा तेल, 60 दिनों की नेचुरल गैस और 45 दिनों का LPG (रसोई गैस) का स्टॉक मौजूद है। यानी अभी किसी तत्काल संकट की बात नहीं है। अगर कल से तेल आना भी बंद हो जाए, तो भी दो महीने तक देश चल सकता है।

लेकिन बुरी खबर यह है कि देश की तेल कंपनियों (जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम) को हर दिन लगभग ₹1000 करोड़ का नुकसान हो रहा है।

यानी एक दिन में इतना नुकसान, जितना एक छोटा शहर साल भर में टैक्स नहीं भरता। तो ये मामला बिल्कुल सीधा नहीं है। आइए, डिटेल में समझते हैं।

सबसे पहले – इतना नुकसान क्यों हो रहा है?

बात समझने में कठिन नहीं है। आमतौर पर हम जो पेट्रोल-डीजल पंप पर भरते हैं, उसके दाम दो चीजों पर तय होते हैं – एक, कच्चे तेल की कीमत जो भारत खरीदता है, और दूसरा, उस पर लगने वाला टैक्स।

अब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ गए हैं (ईरान-इज़राइल तनाव की वजह से)। लेकिन सरकार ने अभी पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाई हैं – क्योंकि चुनाव थे, और आम जनता पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालना चाहती थी।

तो क्या हो रहा है?

  • कंपनियां तो कच्चा तेल महंगा खरीद रही हैं,

  • लेकिन पेट्रोल-डीजल घरेलू बाजार में सस्ता बेच रही हैं।

जितना वो खरीद रही हैं और जितना बेच रही हैं – इसी अंतर से उन्हें हर रोज़ ₹1000 करोड़ का नुकसान हो रहा है। कुल मिलाकर, अब तक यह नुकसान हजारों करोड़ पहुंच चुका है।

अब बात करते हैं – 60 दिन के स्टॉक की

यह अच्छी बात है कि सरकार ने पिछले कुछ सालों में रणनीतिक भंडारण (Strategic Storage) पर जोर दिया है। देश के अलग-अलग जगहों पर विशाल भूमिगत गुफाएं (underground caverns) बनाई गई हैं, जहां कच्चा तेल संग्रहीत किया जाता है।

इनमें विशाखापत्तनम, मैंगलोर, पडूर (कर्नाटक), और चांडीखोल (ओडिशा) में करीब 5.33 मिलियन टन तेल भरा हुआ है।

ये वो तेल है जो किसी युद्ध या प्राकृतिक आपदा के वक्त काम आता है।

तो भले ही होरमुज जलडमरूमध्य बंद हो जाए, या ईरान में हालात बिगड़ जाएं, फिर भी भारत 60 दिनों तक बिना तेल आयात के चल सकता है। यानी रणनीतिक लेवल पर देश मजबूत है।


पर समस्या ये है – 60 दिन के बाद क्या?

यही सबसे बड़ा सवाल है।

  • अगर पश्चिम एशिया में तनाव 60 दिन से ज्यादा रहा,

  • और कच्चा तेल महंगा ही खरीदना पड़ता रहा,

  • और घरेलू कीमतें नहीं बढ़ाई गईं,

तो कंपनियां दिवालिएपन की कगार पर आ सकती हैं। नुकसान इतना अधिक हो चुका है कि वे बहुत लंबे समय तक यह जारी नहीं रख सकतीं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार अब दो विकल्पों के बीच फंस गई है:

  1. पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दें, जिससे महंगाई बढ़ेगी और आम आदमी की जेब पर असर पड़ेगा।

  2. कंपनियों को नुकसान उठाने दें, लेकिन फिर वे कर्ज में डूब जाएंगी और आने वाले समय में देश को बड़ा आर्थिक झटका लगेगा।

दूसरे शब्दों में – सरकार चाहे जैसा भी फैसला ले, उसे कहीं न कहीं गांठ बांधनी पड़ेगी।

अब आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?

फिलहाल सरकार ने कहा है – कि आप घबराएं नहीं, देश में पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं है। यह सही है। लेकिन ज्यादा चिंता की बात यह है कि अगर यह स्थिति महीनों तक बनी रही, तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं। और सिर्फ यही नहीं, इससे हर चीज़ पर असर पड़ेगा – सब्जी से लेकर किराना, कपड़े से लेकर किराया तक, सब कुछ महंगा हो जाएगा।

और जो लोग हाथ से मुंह चलाते हैं, उन पर यह सबसे भारी पड़ेगा।

तो निष्कर्ष क्या है?

  • तुरंत कोई संकट नहीं – स्टॉक पर्याप्त है।

  • देश थोड़े समय के लिए सुरक्षित है (60 दिन)।

  • लेकिन अगर पश्चिम एशिया में तनाव नहीं घटा, तो आपात स्थिति के बादल मंडराने लगेंगे।

  • ऑयल कंपनियों की सेहत पतली होती जा रही है – वे बहुत लंबे समय तक यह नुकसान नहीं झेल सकतीं।

यह एक नाजुक स्थिति है। सरकार ने स्टॉक तो मजबूत किया, लेकिन अब कीमतों के बीच संतुलन बनाना उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

सीधी बात – भारत ऊर्जा मोर्चे पर आज थोड़ा मजबूत है, लेकिन आने वाला समय बताएगा कि ये तैयारियां कितनी कारगर साबित होती हैं। फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है, लेकिन आंखें खुली रखनी चाहिए।

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