श्रीनगर पहुंचीं स्विट्जरलैंड की राजदूत, कश्मीर के लिए सीखे ये 4 खास सबक

 

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श्रीनगर | 28 मई 2026

आमतौर पर जब कोई विदेशी नेता या राजदूत कश्मीर आते हैं, तो चर्चा सियासत और इंसानी हकूक तक सीमित रहती है। लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ।

माया तिसाफी, स्विट्जरलैंड की राजदूत, जो कि भारत में तैनात हैं, हाल ही में श्रीनगर पहुंचीं। लेकिन उनके सूटकेस में खुलकर राजनीति नहीं थी, बल्कि मौसम (पर्यटन), ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी थी।

क्या था असली मकसद?

यह दौरा सिर्फ हाथ मिलाने तक सीमित नहीं रहा। राजदूत ने यह समझने की कोशिश की कि कश्मीर के युवाओं को कैसे रोजगार से जोड़ा जाए। पूरे दिन चली बातचीत का फोकस सीधे तौर पर 4 बड़े क्षेत्रों पर रहा, जहां स्विट्जरलैंड दुनिया में सबसे आगे है:

  1. व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) - स्विट्जरलैंड ने 'ऐपरेंटिसशिप' (काम सीखते हुए पढ़ाई) का ऐसा मॉडल बना रखा है, जिसकी दुनिया में कोई बराबरी नहीं। उन्होंने कश्मीर के नौजवानों को भी यही 'ऑन-द-जॉब' ट्रेनिंग देने की बात कही।

  2. आतिथ्य (Hospitality) - घाटी में होटल और रेस्टोरेंट तो हैं, लेकिन 'विश्व स्तरीय' सर्विस और स्टाफ की कमी है। इस सेक्टर को दुरुस्त करने में स्विट्जरलैंड की मदद ली जा सकती है।

  3. खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) - कश्मीर में सेब, केसर और अखरोट तो खूब होता है, लेकिन उसे अच्छे से प्रोसेस करके दुनिया भर में बेचने का सिस्टम कमजोर है। स्विस टेक्नोलॉजी इसे एक्सपोर्ट फ्रेंडली बना सकती है।

  4. पर्यटन (Tourism) - स्विट्जरलैंड ने पहाड़ों और झीलों को कैसे बेचा, यह सीखने की बहुत गुंजाइश है। भीड़भाड़ वाले स्थानों (जैसे गुलमर्ग या पहलगाम) को कैसे आधुनिक बनाया जाए, इस पर भी चर्चा हुई।

श्रीनगर के लिए यह क्यों है अहम?

जब 'द हिंदू' अखबार जैसे बड़े मीडिया हाउस यह खबर छाप रहे हैं, तो इसका मतलब यही है कि विदेशी निवेशक अब 'कश्मीर' में बिजनेस के अवसर तलाश रहे हैं, न कि सिर्फ 'जम्मू'। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है।

अब तक जो सहायता मिलती थी, वह अक्सर एनजीओ और सरकारी योजनाओं के जरिए होती थी। लेकिन अगर स्विट्जरलैंड जैसा देश अपनी कंपनियों और ट्रेनिंग सेंटर के साथ आता है, तो इसका सीधा फायदा यह होगा कि कश्मीर के युवाओं को दुबई या यूरोप नहीं जाना पड़ेगा, उन्हें यहीं घर बैठे विदेशी स्तर की स्किल सीखने को मिलेगी।

आगे क्या होगा?

यह दौरा कोई अंतिम डील नहीं है, बल्कि एक शुरुआत है। अगर ये चर्चाएं हकीकत में बदलती हैं, तो पहला असर गुलमर्ग और पहलगाम में बनने वाले नए होटल ट्रेनिंग सेंटर्स में दिखेगा।

सीधी बात: पिछले कई सालों से हम सुन रहे थे कि 'कश्मीर बदल रहा है', लेकिन इस बार यह बदलाव 'स्विट्जरलैंड' की मदद से घाटी में असली नौकरियां ला सकता है। फिलहाल रोजगार और हुनर की इस कवायद पर नजर बनी हुई है।





 

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