रायपुर में पेट्रोल 104.32 रुपये लीटर पहुंचा, डीजल भी महंगा; 4 दिन पहले 3-3 रुपये बढ़े थे दाम, अब रसोई तक पड़ेगा असर

 


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों ने एक बार फिर आम आदमी की जेब पर हाथ साफ करना शुरू कर दिया है। ताजा बढ़ोतरी के बाद रायपुर में पेट्रोल 104.32 रुपये प्रति लीटर के पार पहुँच गया है। साथ ही डीजल के दामों में भी करीब 90 पैसे प्रति लीटर का इजाफा हुआ है। यह बढ़ोतरी महज चार दिन के अंदर दूसरी बड़ी वृद्धि है, क्योंकि उससे पहले ही पेट्रोल और डीजल 3-3 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो चुके थे।


अब इस बढ़ोतरी ने साफ कर दिया है कि इसका असर अब सिर्फ गाड़ी वालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीधा असर रसोई, बाजार और आम परिवारों के बजट पर पड़ेगा।


जेब पर बढ़ा बोझ – किसान से लेकर दफ्तर कर्मचारी तक परेशान


रायपुर की सड़कों पर पेट्रोल पंपों के सामने जैसे ही नई दरों का बोर्ड लगा, लोगों की सांसें तंग हो गईं। जो परिवार पहले से महंगाई के मारे हर महीने गणित लगाकर खर्च चला रहे हैं, उनके लिए यह बढ़ोतरी किसी झटके से कम नहीं।


एक सरकारी कर्मचारी, जो रोज 30 किलोमीटर स्कूटी से दफ्तर जाता है, अब हर महीने डेढ़-दो हजार अतिरिक्त खर्च का अनुमान लगा रहा है। ऑटो चालकों की तो और भी बुरी हालत है – भाड़ा तय है, लेकिन पेट्रोल के दाम उछल रहे हैं। एक ऑटो चालक का कहना है – "अब क्या करें? सवारी कम होगी तो नुकसान, दाम बढ़ाएँगे तो भाग जाएँगे।"


वहीं छोटे कारोबारी भी इस मार से बचे नहीं हैं। ईंधन महंगा होने से उनके माल ढुलाई का खर्च बढ़ गया है, और ग्राहक कम हो रहे हैं।


4 दिन में दूसरी बढ़ोतरी – सरकार खामोश क्यों?


लोगों में गुस्से का एक बड़ा कारण यह भी है कि एक तरफ सरकार यह कहती है कि वह जनता की रक्षा कर रही है, वहीं चार दिन में दूसरी बार ईंधन के दाम बढ़ा दिए गए। चार दिन पहले 3-3 रुपये की बढ़ोतरी हुई, और अब ताजा वृद्धि के बाद पेट्रोल 104 रुपये के पार पहुँच गया है।


लोगों का साफ सवाल है – "सरकार को चुनाव से पहले हमारी याद आई, और सत्ता में आते ही महंगाई ने जोड़े तोड़ने शुरू कर दिए?"


विपक्ष ने भी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेताओं ने कहा है कि यह 'जनता से वसूली' का खेल है और चुनावी वादों को भूलकर अब सरकार ने अपनी असली सूरत दिखाना शुरू कर दिया है।


परिवहन से लेकर सब्जी, दूध और राशन तक – सब पर लगेगी मार


सबसे बड़ा डर यह है कि ईंधन महंगा होने का अंतिम ग्राहक हमेशा आम आदमी होता है। ट्रक से लेकर छोटे वाहन तक, सबका खर्च बढ़ता है। सब्जी मंडी से दूध वालों तक, सब पर असर पड़ना तय है।


एक दुकानदार के मुताबिक – "पिछली बार जब पेट्रोल बढ़ा था, तो 10-15 दिन में ही आलू-प्याज के दाम बढ़ गए थे। यह बढ़ोतरी तो और बड़ी है।"


विशेषज्ञों का कहना है कि जब डीजल महंगा होता है, तो खाद्य वस्तुओं की ढुलाई महंगी पड़ने लगती है। और यह लागत सीधे उपभोक्ता तक पहुँचती है। यानी रोटी, दाल, सब्जी, फल, दूध – सब कुछ महंगा हो सकता है। और इस बार की बढ़ोतरी इतनी तेज है कि असर जल्दी ही दिखने लगेगा।


घर की रसोई पर भी पड़ेगा सीधा असर – गृहिणियाँ परेशान


जब ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, तो सबसे पहले असर रसोई में दिखता है। सब्जियाँ महंगी होती हैं, खाना पकाने की गैस के दाम पर दबाव बढ़ता है। कई गृहिणियों ने चिंता जताई है कि पहले से ही बजट टाइट है, अब और कटौती करनी पड़ेगी।


एक गृहिणी ने सीधा सवाल किया – "बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया, दवा, खाना… और अब पेट्रोल की मार। बताइए, बचेगा क्या हमारे पास?"


क्या है विकल्प? लोग साइकिल और सार्वजनिक परिवहन को कर रहे तरजीह


बढ़ते पेट्रोल-डीजल के दामों के बीच अब लोग विकल्प तलाशने लगे हैं। कई रोज़ाना ऑफिस जाने वालों ने साइकिल निकाल ली है। कुछ रेलवे या सिटी बस सर्विस का सहारा लेने लगे हैं। कारपूल और ऑटोपूल की सेवाओं की डिमांड भी बढ़ी है।


लेकिन यह विकल्प हर किसी के बस की बात नहीं है, खासकर छोटे बच्चों वाले परिवार और बुजुर्गों के लिए। इसलिए अधिकांश लोगों के पास अभी भी निजी वाहन ही सहारा है, और कीमत बढ़ने पर उन्हें ही भुगतना पड़ रहा है।


अंतरराष्ट्रीय बाजार या सरकारी टैक्स – आखिर क्या है कारण?


केंद्र सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़े हैं, जिसका असर यहाँ पड़ता है। लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार ने ही टैक्स कम करने के बजाय उसे यथावत रखा है, जिससे राहत नहीं मिल पा रही।


विशेषज्ञों के अनुसार दाम का एक बड़ा हिस्सा टैक्स (केंद्र का एक्साइज और राज्यों का VAT) होता है। जब तक टैक्स संरचना में कटौती नहीं होगी, तब तक आम आदमी को सच्ची राहत नहीं मिल सकती।


 अब सबकी नजर राहत पर


रायपुर में पेट्रोल 104.32 रुपये प्रति लीटर होने के बाद अब महंगाई का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा। चार दिन में दूसरी बढ़ोतरी ने लोगों का भरोसा तोड़ा है। लोगों का साफ कहना है – "हम तो गाड़ी कम चलाएँगे, लेकिन दूध, सब्जी और गैस के दाम कैसे कम करेंगे?"


अब सारी निगाहें सरकार और तेल कंपनियों पर हैं कि वे आगे ऐसा कोई कदम उठाती हैं, जिससे ईंधन के दाम स्थिर हों और आम जनता को राहत मिले। तब तक, आम आदमी को इस उबड़-खाबड़ महंगाई के रास्ते पर चलना है – एक हाथ में बटुआ, दूसरे में संकल्प कि 'गुजारा करेंगे, और क्या

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