बस्तर के धन-भंडार का रहस्य: क्या नक्सली 1000 करोड़ की लेवी जंगलों में दफन कर गए?

 


सुरक्षा बलों को सिर्फ 2-3% राशि ही मिली है, बाकी 95% से अधिक फंड का पता लगाने के लिए जीपीआर रडार और विशेष रणनीति से छेड़ा जाएगा अभियान।

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के घने और दुर्गम जंगल सिर्फ माओवादी गतिविधियों के लिए ही नहीं, बल्कि अब एक विशाल आर्थिक रहस्य के लिए भी चर्चा में हैं। ताजा खुफिया रिपोर्टों और जांच एजेंसियों के आकलन ने एक चौंकाने वाला तथ्य उजागर किया है - नक्सली संगठनों ने पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न माध्यमों से लगभग 1000 करोड़ रुपए की लेवी (रंगदारी) वसूली है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा कहीं गायब है और अब यह धन सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक पहेली बना हुआ है।

सूत्रों के अनुसार, बस्तर में सक्रिय नक्सली संगठन हर साल लौह खनन, सड़क निर्माण, ठेका-निर्माण, और स्थानीय व्यापारियों से लगभग 80 से 100 करोड़ रुपए वार्षिक की लेवी वसूलते थे। गणित के हिसाब से पिछले एक दशक में यह राशि हजारों करोड़ में होनी चाहिए। लेकिन सुरक्षा बलों के पिछले पांच वर्षों के सबसे बड़े अभियानों में भी जो बरामदगी हुई है, वह महज 15 से 25 करोड़ रुपए के बीच रही है। यानी, एजेंसियों के पास वसूली गई करीब 95 फीसदी रकम का कोई पता नहीं है।

यह आंकड़ा अब हर जांच एजेंसी के लिए सिरदर्द बन चुका है। सवाल साफ है - इतनी बड़ी रकम आखिर जाती कहां है? इसी सवाल के जवाब की तलाश में बस्तर में केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों ने एक बृहद स्तरीय खोज अभियान शुरू कर दिया है। इस अभियान का सबसे बड़ा फोकस इंद्रावती टाइगर रिजर्व और अबूझमाड़ के दुर्गम घने जंगल हैं। यह वही इलाका है, जहां नक्सली कमांडर अब तक सुरक्षित पनाहगाह मानते थे और जहां बरामदगी लगभग शून्य रही है।

तीन बड़ी थ्योरी: पैसा कहां है?

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की निगरानी में ली गई जानकारी के आधार पर, एजेंसियों ने तीन प्रमुख संभावनाएं निकाली हैं:

  1. जंगलों में दफन खजाना (अर्थ वर्क): यह सबसे चौंकाने वाली थ्योरी है। कई सरेंडर किए गए माओवादियों का दावा है कि विशाल राशि को प्लास्टिक के बड़े ड्रमों में भरकर जमीन के नीचे गाड़ दिया गया है। इन ड्रमों के स्थान और उन्हें खोलने के कोड केवल शीर्ष कमांडरों के पास हैं और एक-दूसरे की मौत की सूरत में यह पैसा वहीं पड़ा रहता है। यही कारण है कि अब सुरक्षा बल ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) तकनीक का उपयोग करेंगे, जो जमीन के अंदर दबी धातु या प्लास्टिक की वस्तुओं का पता लगा सकता है।

  2. शहरी नेटवर्क और हवाला: दूसरी बड़ी आशंका यह है कि लेवी का एक विशाल हिस्सा ओवर ग्राउंड वर्कर्स (नक्सलियों से जुड़े शहरी लोगों) के जरिए हवाला के रास्ते बड़े शहरों में पहुंचाया गया। यहां इस पैसे को रियल एस्टेट, बेनामी संपत्तियों या फर्जी कंपनियों में निवेश कर दिया गया है। अब फाइनेंशियल ट्रैकिंग टीमें उन इलाकों में अचानक हुए बड़े लेन-देन और संपत्ति खरीद पर नजर गड़ाए हुए हैं।

  3. लॉजिस्टिक्स और हथियारों में खर्च: तीसरी सामान्य थ्योरी के अनुसार, इस रकम का एक हिस्सा तो संगठन चलाने में खर्च हो ही जाता है - जैसे आधुनिक हथियारों की खरीद, माओवादियों की वर्दी, राशन, और शहीद किए गए कैडरों के परिवारों को मुआवजा। लेकिन इतने बड़े अनुपात में इसका खर्च होना आंकड़ों के हिसाब से असंभव है, इसलिए यह थ्योरी कमजोर पड़ती जा रही है।

सोने में बदल गया पैसा

एक और महत्वपूर्ण खुलासा हाल की बरामदगी से हुआ है। नोटबंदी के बाद नकदी को लेकर मुश्किलें बढ़ने पर नक्सलियों ने अपने फंड को सुरक्षित रखने के लिए सोने का विकल्प चुनना शुरू कर दिया। सिर्फ पिछले महीने ही बीजापुर और जगदलपुर में सुरक्षा बलों ने कुल 8 किलो सोना बरामद किया है, जिसकी बाजार कीमत करीब 6.5 से 7 करोड़ रुपए आंकी गई है। एजेंसियों को संदेह है कि गायब हजारों करोड़ में से एक बड़ा हिस्सा इसी तरह सोने के रूप में तब्दील करके जंगलों या शहरों में छुपा दिया गया होगा।

बस्तर में नई रणनीति

बस्तर के आईजी सुंदरराज पी. के नेतृत्व में इस अभियान को नई दिशा दी जा रही है। इसमें तीन स्तरीय रणनीति बनाई गई है:

  1. टेक्नोलॉजी का उपयोग: जीपीआर रडार से उन जगहों की स्कैनिंग, जहां सरेंडर नक्सलियों ने पैसे दफन बताए हैं।

  2. इंटेलिजेंस मैपिंग: पुराने नक्सल ठिकानों और सुरक्षित पनाहगाहों की नए सिरे से मैपिंग।

  3. सरेंडर नक्सलियों की मदद: जिन नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, खासकर पापा राव जैसे बड़े नामों को, इस खोज अभियान में शामिल किया जा रहा है। उनके द्वारा दी गई जानकारियों को आधार बनाकर जमीनी स्तर पर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है।

क्या वाकई बस्तर के जंगलों में 'नक्सली सोने का खजाना' दफन है? या यह पैसा शहरों के गलियारों में पहले ही लावारिस संपत्तियों में तब्दील हो चुका है? फिलहाल, यह एक खुली पहेली बनी हुई है। लेकिन इतना तय है कि सुरक्षा एजेंसियां अब हर संभावना को तलाशने और इस 1000 करोड़ के 'भूत' को किसी न किसी रूप में पकड़ने के लिए पूरी तरह जुट गई हैं। यह अभियान न सिर्फ नक्सल वित्तीय ढांचे को ध्वस्त करने के लिए बल्कि बस्तर के विकास में बाधक इस काले धन को जब्त करने की एक बड़ी पहल है।

Post a Comment

0 Comments