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| Photo: Amit Shah Wikimedia Commons |
गृह मंत्री अमित शाह ने एक बात बहुत साफ कही है – आज के ज़माने में टेक्नोलॉजी और न्याय व्यवस्था को हाथ से हाथ मिलाकर चलना होगा। लेकिन इतना ही नहीं, उन्होंने ये भी कहा कि जैसे-जैसे AI (Artificial Intelligence) तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे यह हमारी अदालतों और जस्टिस सिस्टम के लिए नई परेशानियाँ भी खड़ी कर रहा है।
एक प्रोग्राम में उन्होंने ये सब कहा। उनका कहना था कि अगर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सही दिशा में किया जाए तो इससे न्याय और तेज़ और पारदर्शी हो सकता है। लेकिन इसके लिए हमें पक्के कानून और साफ-साफ नियम चाहिए, नहीं तो फ़ायदा नहीं होगा।
AI हमारे सामने कैसी मुश्किलें खड़ी कर सकता है?
अमित शाह ने ये भी बताया कि जहाँ एक तरफ AI हमारी लाइफ आसान बना रहा है, वहीं इससे गलत चीज़ों का खतरा भी बढ़ गया है। जैसे:
डीपफेक और बनावटी सबूत: अब तकनीक इतनी ताकतवर हो गई है कि किसी के चेहरे, आवाज़ या वीडियो को पूरी तरह बदलकर झूठा सबूत तैयार कर दिया जाता है। अब अदालत के लिए ये पता लगाना मुश्किल होगा कि असली क्या है और नकली क्या।
अपराध भी डिजिटल होते जा रहे हैं: पहले चोरी-डकैती होती थी, अब हैकिंग, डेटा चोरी, ऑनलाइन फ्रॉड – ये मामले इतने पेचीदा हो गए हैं किनॉर्मल पुलिस या कोर्ट के लिए इनकी जांच करना आसान नहीं रहा।
कानून टेक्नोलॉजी के पीछे भाग रहे हैं: टेक्नोलॉजी रोज़ बदलती है, लेकिन कानून बहुत धीरे बदलते हैं। जब तक एक नियम बनता है, तब तक नया टेक्नोलॉजी आ जाता है। ये बड़ी समस्या है।
तो अब क्या करना होगा?
अमित शाह ने साफ कहा कि जैसे अपराधी नई-नई तकनीकें सीख रहे हैं, वैसे ही हमारी पुलिस और कोर्ट को भी खुद को अपडेट करना होगा। नहीं तो वो एक कदम पीछे रह जाएँगे।
उन्होंने कुछ बातें ऐसी बताईं:
डिजिटल सबूतों की सच्चाई पता करने के लिए नए तरीके ढूंढने होंगे।
वकीलों, जजों, पुलिस को ट्रेनिंग देनी होगी – उन्हें साइबर क्राइम और डिजिटल फॉरेंसिक समझना होगा।
साइबर सेल और फॉरेंसिक लैब्स को और मजबूत बनाना पड़ेगा।
भारत के लिए ये मामला आखिर क्यों जरूरी है?
देखिए, भारत अब तेज़ी से डिजिटल हो रहा है। ऑनलाइन पैसे लेन-देन से लेकर कागज़ात तक – सब कुछ अब मोबाइल और इंटरनेट पर आ गया है। जितना हम डिजिटल होंगे, उतने ही साइबर अपराध बढ़ेंगे।
अगर हमारी अदालतें पुराने तरीकों से काम करती रहीं, तो अपराधी बचते रहेंगे। इसलिए जरूरी है कि हमारी न्याय प्रणाली भी डिजिटल रूप से सक्षम बने। और AI जैसी तकनीकों के लिए नए कानून भी बनाने होंगे।
तो आखिर नतीजा क्या?
अमित शाह की इस बात का सीधा मतलब है – तकनीक से मुंह मोड़कर नहीं चल सकते। उसे तो अपनाना ही होगा, लेकिन उसी के साथ संतुलन भी रखना होगा। अगर हमने अभी से तैयारी नहीं की, तो आने वाले वक्त में हमारे लिए मुश्किलें और बढ़ जाएँगी।
सीधी-सीधी बात ये है कि अब न वकील पुरानी चाल में चल सकते हैं, न जज किताबी ज्ञान के सहारे बैठे रह सकते हैं। आने वाला समय डिजिटल है और उसी हिसाब से हमें खुद को ढालना होगा।
"टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल जस्टिस को तेज़ और सस्ता बना सकता है – बस ज़रूरत है सही संतुलन और तैयारी की।" – अमित शाह (लगभग)

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