रायपुर। अक्सर शादी की बात आते ही हम एक सुनसान सी गूंज सुनते हैं – महंगाई, इंतजाम, लाखों-करोड़ों का बजट। लेकिन क्या हो, अगर शादी का यह खर्चा सिर्फ दो परिवारों का न होकर पूरे समाज का हो? और भाई-बहनों का एक नहीं, बल्कि एक साथ 51 जोड़ों का विवाह हो? यह सपना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हुआ एक ऐसा आयोजन है, जिसने सामाजिक एकता और मानवीय संवेदना की मिसाल पेश कर दी।
अग्रवाल समाज ने एक भव्य सामूहिक विवाह समारोह का आयोजन किया, जहां 51 जोड़ों ने वैदिक मंत्रों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ एक साथ सात फेरे लिए। यह कार्यक्रम केवल रस्मों का नहीं, बल्कि उन लोगों के सपनों का था, जो शायद आर्थिक तंगी के कारण अपनी ही बेटी की शादी के लाखों-करोड़ों के खर्च से डरते थे। मगर इस आयोजन ने उसी डर को उम्मीद में बदल दिया।
जब भव्यता के साथ मिल जाए संवेदना: देखते ही बनता है नजारा
शादी का यह आयोजन किसी मेले से कम नहीं था। होटलों और गार्डन की बजाय एक बड़े हॉल में सजावट की गई थी, पर उस सजावट का रंग कुछ अलग था – वहां हर कोने में एक परिवार की ख़ुशी बिखरी थी। 51 दूल्हे और 51 दुल्हनें – सभी पारंपरिक पोशाकों में सजे हुए थे। कोई लाल पगड़ी बांधे दूल्हे के रूप में शान से खड़ा था, तो कोई लहंगे की लाली में अपने घर लौटने का सपना संजो रहा था।
सबसे ज्यादा दिल वाला पल तब आया, जब सभी जोड़ों ने एक साथ सात फेरे लिए। मंच पर एकत्र उन 51 जोड़ों के चेहरों पर डर नहीं, बल्कि एक सुकून था – कि अब उनका होने वाला कल बिना किसी कर्ज और चिंता के होगा।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बड़ी राहत
आप क्या करोगे, जब आपके पास नौकरी से ज्यादा महंगी शादी की फिक्र हो? जी हां, यह वही दर्द है, जो लाखों परिवारों को रातों की नींद से जगा देता है। बेटी का हाथ पीले करना किसी उत्सव से कम नहीं, लेकिन जब ‘बेटी के दहेज’ की बात आती है, तो कितने ही सपने टूट जाते हैं। ऐसे में अग्रवाल समाज के इस कदम ने 51 ऐसे परिवारों को राहत दी है, जो शायद बैंक ब्याज और कर्ज के दलदल में फंस चुके थे।
यह आयोजन – सिर्फ विवाह संपन्न कराने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन परिवारों को एक भरोसा दिलाया कि “तुम अकेले नहीं हो, पूरा समाज तुम्हारे संग है।”
उपहार भी मिले, संस्कार भी दिए गए
इन नवदंपतियों को ‘गृहस्थी की शुरुआत’ के लिए जरूरी सामान भी दिया गया – बर्तन, कपड़े, दैनिक उपयोग की वस्तुएं और बहुत कुछ। इससे दुल्हनें अपनी नई दहलीज पर बोझ लेकर नहीं, बल्कि हल्के-फुल्के कदमों से कदम रख सकें।
हो सकता है कि यह सामान छोटा लगे, लेकिन एक ऐसे परिवार के लिए, जिसने बेटी की शादी के लिए सोना तक गिरवी रखा हो – यही सामान एक बड़ी सौगात होता है।
पारदर्शी चयन प्रक्रिया: कोई भेदभाव नहीं
यह सब बेतरतीब नहीं हुआ। समाज के पदाधिकारियों ने पहले से एक पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई – आवेदन मांगे गए, पात्रता की जांच की गई, और फिर सबसे जरूरतमंद 51 जोड़ों का चयन किया गया। यहाँ न कोई सिफारिश कारगर थी, न कोई रस्म-ए-रिश्वत। सिर्फ पात्रता और जरूरत।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का संदेश भी गूंजा
इस मौके पर समाज के बड़े लोगों ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के इस अभियान को दमदार समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि “बेटियों की शादी बोझ नहीं, वरदान है। अगर उनका अपना समाज उनके साथ खड़ा है, तो फिर इस देश की हर बेटी आत्मनिर्भर और खुशहाल हो सकती है।”
हर साल बढ़ती भागीदारी की कहानी
गौर करने वाली बात है कि अग्रवाल समाज का यह सामूहिक विवाह का सिलसिला कोई पहली बार शुरू नहीं हुआ है। पिछले कुछ सालों से यह परंपरा चली आ रही है, और हर बार इसमें भाग लेने वाले जोड़ों की संख्या बढ़ रही है। कारण साफ है – यह आयोजन महज रस्मों को पूरा करने का नहीं, बल्कि किसी के सपने को उड़ान देने का है।
सिर्फ दो परिवार नहीं, पूरा समाज बना साक्षी
इस खास पल में सिर्फ दूल्हा-दुल्हन के परिवार ही नहीं थे; बल्कि समाज के कई गणमान्य लोग, जनप्रतिनिधि और आम लोग भी मौजूद थे। सबने मिलकर नवदंपतियों को आशीर्वाद दिया। यह देखकर सच में लगा – जब 51 परिवार एक साथ खुश होते हैं, तो पूरा हॉल एक बड़े परिवार जैसा लगने लगता है।
क्या करते हैं इस आयोजन से सीख?
यह आयोजन केवल अग्रवाल समाज का नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक मिसाल है। यह बताता है कि अगर एक समाज के तौर पर हम एकजुट हों, मिल-बैठ कर सोचें, तो सैकड़ों लोगों की जिंदगी बदल सकती है। यहाँ किसी ने किसी के ऊपर एहसान नहीं किया, बल्कि सबने मिलकर एक जरूरत पूरी की।
51 कहानियों की नई शुरुआत
तो यह थी रायपुर की वह शाम, जब 51 जोड़ों ने एक साथ सात फेरे लिए। यह खबर महज किसी इवेंट की नहीं, बल्कि 51 सपनों के सच होने की है। 51 ऐसी दुल्हनों की, जिनके माता-पिता निश्चिंत हो गए, और 51 ऐसे दूल्हों की, जिन्होंने बिना किसी बंधन के गृहस्थी की शुरुआत की।
अगर समाज इसी तरह आगे बढ़ता रहे, तो एक दिन शायद ‘दहेज प्रथा’, ‘शादी का बोझ’ जैसे शब्द इतिहास की किताब में सिर्फ एक नोट बनकर रह जाएं।
नव दंपतियों को ढेर सारी बधाई और समाज को सलाम।

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