नर्सरी-केजी को RTE से बाहर करने पर बवाल: सरकार ने हाईकोर्ट में कहा- 70 करोड़ का बोझ, विरोधियों ने कहा- बच्चों के साथ अन्याय
छत्तीसगढ़ में शिक्षा को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मामला है प्री-प्राइमरी (नर्सरी और केजी) कक्षाओं को राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट के दायरे से बाहर रखने का। सरकार ने हाईकोर्ट में पूरी गंभीरता से अपना पक्ष रखते हुए इसे आर्थिक मजबूरी बताया है, तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और शिक्षा विशेषज्ञ इसे बच्चों के मूल अधिकारों पर करारा प्रहार मान रहे हैं। आइए, पूरे झगड़े को ऐसे समझते हैं जैसे कोई आपको गप्पे मार रहा हो।
दरअसल, पूरा मामला क्या है?
दोस्तों, RTE एक्ट एक तरह से उन बच्चों को ढाल देता है जो छह से 14 साल के बीच हैं। यह कानून कहता है कि हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मिलनी चाहिए। लेकिन राज्य सरकार ने अब साफ कर दिया है कि नर्सरी, LKG और UKG जैसे प्री-प्राइमरी स्तर इस कानून के दायरे में नहीं आएंगे। यानी इन कक्षाओं के लिए न तो सरकारी स्कूलों में दाखिले पर कोई पाबंदी होगी और न ही प्राइवेट स्कूलों को RTE के तहत मुफ्त शिक्षा देना अनिवार्य होगा।
इस फैसले के खिलाफ अदालत में याचिकाएँ दायर हुईं, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्री-प्राइमरी बच्चे की नींव रखने वाला सबसे जरूरी दौर होता है। यहीं से बच्चे अनुशासन, बुनियादी साक्षरता और स्कूल जाने की आदत सीखते हैं। अगर इसी उम्र में उन्हें सरकारी मदद से बाहर कर दिया जाएगा, तो गरीब परिवारों के बच्चे तो पूरी तरह से शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हो जाएंगे।
सरकार ने हाईकोर्ट में रखे चार ठोस तर्क
सरकार बिल्कुल चुप नहीं बैठी है। उसने अदालत में अपने फैसले के पक्ष में चार जोरदार दलीलें पेश की हैं।
पहला तर्क – कानून का दायरा: सरकार का कहना है कि RTE कानून साफ-साफ 6 से 14 साल के बच्चों की बात करता है। तीन से पांच साल के बच्चों की प्री-प्राइमरी शिक्षा इस कानून के मूल उद्देश्य में कभी शामिल नहीं थी। इसलिए इसे बाहर करना कोई नया पाप नहीं, बल्कि जो पहले से था, उसे सही रूप में परिभाषित करना है।
दूसरा तर्क – ‘गलती’ सुधार रहे हैं: सरकार ने अदालत में ये भी कहा कि पहले प्री-प्राइमरी को RTE में शामिल कर लेना एक प्रशासनिक चूक थी। अब वे उस चूक को सुधार रहे हैं। उनके मुताबिक, यह कोई नया फैसला नहीं, बल्कि पुरानी त्रुटि का खात्मा है।
तीसरा और सबसे दिलचस्प तर्क – 70 करोड़ का आर्थिक बोझ: सरकार ने अदालत को बताया कि अगर प्री-प्राइमरी कक्षाओं को भी RTE के दायरे में रखा गया, तो हर साल राज्य के खजाने पर 70 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्चा आ जाएगा। सरकार कह रही है, “इतना पैसा हमारे पास नहीं है। हमें सीमित संसाधनों को समझदारी से खर्च करना है।”
चौथा तर्क – सही जगह निवेश: सरकार का कहना है कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक (कक्षा 1 से 8) को मजबूत करना ज्यादा जरूरी है। अगर बजट की कमी है, तो हम उन स्कूलों को मजबूत करेंगे जहाँ बच्चे पहले से हैं, नई कक्षाओं पर पैसा फेंकना फिजूल है।
विरोधियों का पलटवार – “बच्चों के साथ जुआ नहीं खेलिए”
अब इस मामले में विपक्ष और अभिभावक बिल्कुल शांत नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर प्री-प्राइमरी को RTE से बाहर कर दिया गया, तो निजी स्कूल मनमानी फीस वसूलेंगे। गरीब परिवार का बच्चा या तो बिना नर्सरी के सीधा पहली क्लास में आएगा (जहाँ वह पिछड़ जाएगा), या फिर स्कूल ही छोड़ देगा। शिक्षाविद् कह रहे हैं कि 70 करोड़ रुपये को तर्क बनाना ठीक नहीं है। “एक कलेक्टर की शराब पीने की पार्टी का बजट देख लो, फिर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करो,” – ऐसे कटाक्ष सोशल मीडिया पर खूब हो रहे हैं।
आगे क्या होगा? – अब हाईकोर्ट के फैसले से ही तय
फिलहाल पूरी बाजी हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हुई है। अदालत को यह तय करना है कि क्या प्री-प्राइमरी को RTE के दायरे में रखना कानूनन जरूरी है, या सरकार को यह छूट हो सकती है। अगर कोर्ट सरकार के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो नर्सरी और केजी सरकारी स्कीम से पूरी तरह अलग हो जाएंगे। वहीं, अगर कोर्ट याचिकाकर्ताओं के पक्ष में गया, तो सरकार को ढूंढ़ना होगा 70 करोड़ रुपये, चाहे कहीं से भी लाए।
आम आदमी की टेंशन
छत्तीसगढ़ के एक आम आदमी के लिए यह मामला उलझन भरा है। एक तरफ वो सरकार की आर्थिक स्थिति समझता है, तो दूसरी तरफ अपने बच्चे का भविष्य भी देखता है। अगर RTE हट जाता है, तो प्राइवेट स्कूलों में नर्सरी की फीस 30-40 हजार सालाना से भी ज्यादा हो सकती है। एक मजदूर या छोटे दुकानदार के लिए इतनी फीस देना नामुमकिन है।
शायद यह समय है सरकार और अदालत दोनों के लिए यह सोचने का कि क्या 70 करोड़ रुपये (जो बहुत बड़ी रकम है) को बचाने के चक्कर में एक पूरी पीढ़ी की बुनियाद को कमजोर कर देना उचित होगा? फिलहाल जनता को इंतजार है – अदालत का सुनहरा फैसला क्या कहता है।

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