रायपुर। छत्तीसगढ़ की सरकार ने उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए एक नया फॉर्मूला तैयार किया है, जिसे 'डीबीएफ' (डायरेक्ट बेनिफिट फॉर परफॉर्मेंस) नाम दिया गया है। यह सुनने में थोड़ा तकनीकी जरूर लगता है, लेकिन असल में यह एक बेहद सीधी और दिलचस्प योजना है। मतलब साफ है – 'पहले काम करो, उसके बाद ही इनाम पाओ'। इस फॉर्मूले का मकसद उद्योगों से जुड़ी पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, तेज और भ्रष्टाचार से मुक्त बनाना है, ताकि राज्य में नए निवेश आएं और पुराने उद्योग भी खिल उठें।
आइए, आपको पूरी बात आसान भाषा में समझाता हूँ।
आखिर ये DBF फॉर्मूला है क्या?
देखिए, पहले छत्तीसगढ़ में उद्योगों को जो सुविधाएँ और सब्सिडी मिलती थीं, उसमें अक्सर देरी होती थी। कई बार तो उद्योगपति को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे, कागजी कार्रवाई इतनी जटिल थी कि छोटे उद्यमी परेशान हो जाते थे। इस नए डीबीएफ मॉडल में इन सारी परेशानियों को दूर करने की कोशिश की गई है।
इस फॉर्मूले का सबसे बड़ा दिलचस्प पहलू ये है कि इसमें उद्योग को उसके प्रदर्शन के आधार पर लाभ दिया जाएगा। यानी एक कंपनी जितना ज्यादा उत्पादन करेगी, उतना ही ज्यादा प्रोत्साहन उसे मिलेगा। कोई फालतू के झंझट नहीं, न ही बीच में कोई बिचौलिया। सरकारी मदद सीधे उद्योग के खाते में पहुंचेगी। साफ शब्दों में कहें तो – 'जैसा काम, वैसा सम्मान (और इनाम)'।
उद्योगों को क्या-क्या फायदे होंगे?
मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, अगर यह मॉडल सही से लागू हो गया, तो यह छत्तीसगढ़ के उद्योग जगत के लिए वरदान से कम नहीं होगा।
सबसे बड़ा फायदा – समय पर पैसा: अब उद्योगों को महीनों सब्सिडी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। सरकारी प्रोत्साहन तय समय पर सीधे उनके बैंक खाते में आएंगे।
निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा: जब कोई बड़ा निवेशक देखेगा कि यहां पारदर्शी सिस्टम है और समय पर मदद मिल जाती है, तो वह अपना पैसा लगाने से नहीं हिचकेगा।
MSME को खास मदद: छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) के लिए तो यह योजना वरदान साबित हो सकती है। पहले उनके पास न तो लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के संसाधन थे और न ही अधिकारियों के चक्कर लगाने का समय। अब यह सब खत्म हो जाएगा।
नए उद्योग लगाना हुआ आसान: यह फॉर्मूला नए उद्यमियों के लिए रास्ता आसान करेगा, क्योंकि उन्हें पता होगा कि एड़ी-चोटी का जोर लगाकर काम करेंगे तो उन्हें फायदा भी तुरंत मिलेगा।
क्या सिर्फ फायदे ही हैं? चुनौतियाँ भी हैं
लेकिन इतनी अच्छी बातों के साथ एक सच्चाई यह भी है कि इसे लागू करना उतना आसान नहीं होगा, जितना लिखने भर से लगता है। सरकार के सामने कई चुनौतियाँ खड़ी हैं।
पहली चुनौती – प्रशासन को तैयार करना। हमारे यहाँ के अफसर और कर्मचारी सालों से एक तय प्रक्रिया में काम करते आ रहे हैं। अचानक उन्हें नई डिजिटल प्रणाली में काम करना होगा, इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित करना बड़ा काम है। दूसरी बात, छोटे उद्योगों को इस नए फॉर्मूले को समझने में थोड़ी देर लग सकती है। इसलिए सरकार को जागरूकता अभियान चलाना होगा और उद्योगों को ट्रेनिंग देनी होगी।
तीसरी और सबसे अहम बात – पारदर्शिता के दावों पर खरा उतरना। जब तक पूरा सिस्टम सौ फीसदी डिजिटल, ट्रैक करने योग्य और ऑटोमेटेड नहीं हो जाता, तब तक इसमें गड़बड़ी की गुंजाइश रहेगी। सरकार का दावा है कि हर प्रक्रिया को ऑनलाइन किया जाएगा और हर लेनदेन की मॉनिटरिंग होगी, ताकि कोई भ्रष्टाचार न हो सके।
राजनीतिक संकेत और भविष्य की तस्वीर
अगर आप राजनीति की बात करें, तो यह DBF फॉर्मूला सरकार के लिए एक बड़ा और साहसिक कदम है। इससे इशारा साफ है कि प्रदेश सिर्फ वादे करने वाली सरकार नहीं, बल्कि काम करने वाली सरकार बनना चाहती है। रायपुर, रायगढ़, कोरबा और बिलासपुर जैसे शहर पहले से ही इंडस्ट्रियल हब बनते जा रहे हैं। इस नए फॉर्मूले से जैसे उनमें और जान आ जाएगी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह मॉडल सफल रहता है, तो यह सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दूसरे राज्य भी इसे अपनाने पर मजबूर हो जाएंगे। इससे रोजगार के नए अवसर बनेंगे, स्थानीय उत्पाद बढ़ेंगे और प्रदेश की अर्थव्यवस्था को दमदार ताकत मिलेगी।
कुल मिलाकर बात यह है कि – छत्तीसगढ़ अब उद्योगों के लिए 'पहले पैसा, फिर काम' वाली पुरानी मानसिकता से बाहर निकल रहा है। नया फॉर्मूला 'पहले काम, फिर इनाम' का है। पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दिया जा रहा है। बस जरूरत है इसे ईमानदारी से लागू करने की, कागजों तक सीमित न रखने की। अगर ऐसा हुआ, तो आने वाले पांच साल में छत्तीसगढ़, देश के मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल मैप पर सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन सकता है।

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