इलाहाबाद हाईकोर्ट में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कथित दोहरी नागरिकता वाले मामले में हाल ही में एक बड़ा उलटफेर हुआ है। जिस जज के सामने ये केस लंबित था, उन्होंने अचानक खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया है। इस वजह से अब ये पूरा प्रकरण एक नए मोड़ पर आ गया है।
चलिए, आपको पूरी कहानी समझाता हूँ।
दरअसल, ये मामला उस आरोप से जुड़ा है जिसमें कहा जा रहा है कि राहुल गांधी ने भारतीय नागरिकता के साथ-साथ ब्रिटेन की नागरिकता भी ले रखी थी। भारत में दोहरी नागरिकता कानूनन मान्य नहीं है, इसलिए ये आरोप काफी गंभीर माना जा रहा है।
किसी याचिकाकर्ता ने कोर्ट में मांग की थी कि राहुल गांधी के खिलाथ एफआईआर दर्ज की जाए और इसकी जांच हो। पहले हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया था, लेकिन फिर उसी आदेश पर रोक लगा दी गई और कई संशोधन हुए। ये सब देखते ही बनता था, और मामला उलझता चला गया।
अब आता है सबसे ताजा मोड़ पर। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने इस केस से खुद को अलग कर लिया। उन्होंने कहा कि “कुछ अप्रिय परिस्थितियाँ” बन गई हैं, जिसकी वजह से निष्पक्ष सुनवाई मुश्किल हो सकती है। दरअसल, याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी टिप्पणियाँ कीं, जिनसे कोर्ट की कार्यवाही और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और जज ने ये फैसला लिया कि बेहतर होगा कि ये मामला किसी दूसरी पीठ को दे दिया जाए।
अब आगे क्या होगा? ये केस अब मुख्य न्यायाधीश के पास जाएगा, जो एक नई बेंच बनाएंगे। नई बेंच तय करेगी कि राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर होनी चाहिए या नहीं, किसी एजेंसी से जांच करानी चाहिए या नहीं, और क्या इन आरोपों में कोई दम है भी या नहीं। माना जा रहा है कि इस पूरी प्रक्रिया में थोड़ा वक्त लगेगा और केस की सुनवाई में देरी हो सकती है।
ये मामला सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि राजनीति के लिहाज से भी काफी अहम है। राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं, इसलिए ऐसे आरोपों और कोर्ट की कार्यवाही का असर सीधे राजनीति पर भी पड़ना लाजिमी है। वैसे, दोहरी नागरिकता को लेकर भारत का कानून बेहद सख्त है, अगर ये आरोप साबित होते हैं तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं। लेकिन फिलहाल मामला जांच और सुनवाई के दौर में ही है।
तो बात साफ है कि ये केस अब एक नए मोड़ पर है। जज के अलग होने से ये भी साफ हो गया है कि न्यायपालिका निष्पक्षता बनाए रखने को लेकर कितनी सतर्क है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नई बेंच क्या फैसला सुनाती है।

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