अप्रैल में भारत का तेल आयात अचानक गिरा – क्या है वजह?

 
अप्रैल के महीने में भारत ने जितना कच्चा तेल खरीदा, वो पिछले कुछ महीनों के मुकाबले काफी कम रहा। वजह? खाड़ी देशों में सप्लाई के रास्ते बाधित हो गए, जिससे रिफाइनरियों को अपनी तेल खरीद की रणनीति बदलनी पड़ी।

1 अप्रैल से 26 अप्रैल के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने औसतन 4.4 मिलियन बैरल प्रति दिन तेल आयात किया। ये फरवरी के 5.2 मिलियन बैरल प्रति दिन के आंकड़े से काफी कम है।

यह गिरावट ऐसे वक्त में हुई है, जब मिडिल ईस्ट के मुख्य रास्तों पर दबाव बढ़ गया है। नतीजतन, तेल लाने के तरीकों और रास्तों में बदलाव करना जरूरी हो गया।


पुराने साथी तो जारी हैं, लेकिन रास्ते बदल गए

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे पुराने साझेदारों से तेल आता रहा, लेकिन लास्ट-मिनट लॉजिस्टिक्स में बदलाव किए गए।

  • सऊदी अरब से करीब 697,000 बैरल प्रति दिन आया।

  • UAE से लगभग 619,000 बैरल प्रति दिन आया।

लेकिन खास बात ये रही कि ये तेल मुख्य रास्तों से नहीं, बल्कि बैकअप ऑप्शन के जरिए भेजा गया। जैसे – सऊदी अरब के लाल सागर तट पर स्थित यानबू पाइपलाइन और UAE के फुजैरा एक्सपोर्ट टर्मिनल
इन वैकल्पिक रास्तों ने ही सप्लाई को पूरी तरह ठप होने से बचाए रखा।


कमी पूरी करने के लिए नए सप्लायरों पर दांव

जब खाड़ी रास्तों से परेशानी बढ़ी, तो भारत ने दूसरे देशों के दरवाजे भी खटखटाए। खासतौर पर ओमान का नाम सामने आया है।

ओमान से आयात अप्रैल में बढ़कर लगभग 101,000 बैरल प्रति दिन हो गया। अब ये आंकड़ा बड़ा नहीं लग सकता (क्योंकि कुल आयात बहुत ज्यादा है), लेकिन पिछले औसत से ये बहुत ज्यादा है – इससे पहले ये सिर्फ 18,000 बैरल प्रति दिन के आसपास रहता था।

इससे एक बात साफ हो जाती है – भारत की रिफाइनरियां अब एक ही गल्ले पर दौड़ने की बजाय सप्लाई के स्रोतों में विविधता लाने में लगी हैं, ताकि अचानक आने वाली परेशानियों से बचा जा सके।


क्या संदेश है इन आंकड़ों का?

एक तो ये कि जब मुख्य रास्ते बंद होते हैं, तो पूरी सोर्सिंग स्ट्रैटेजी पलक झपकते बदल सकती है।
और दूसरी, भारत जैसा देश जो दूसरों पर निर्भर है, उसके लिए ये सबक है कि लचीलापन और विकल्प होना कितना जरूरी है – खासकर उस समय, जब दुनियाभर में ऊर्जा बाजार में ढांचा डोल रहा हो।

हालांकि अभी ये पता नहीं है कि खाड़ी क्षेत्र के रास्तों में ये रुकावटें कब तक रहेंगी, लेकिन अप्रैल के आंकड़े एक बात जरूर बताते हैं: सिस्टम सुलझ रहा है। वो हर रोज बदलती हालात में खुद को ढाल रहा है, और पुराने साझेदारों से लेकर नए विकल्पों के बीच संतुलन बनाकर चल रहा है।



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